Monday, 29 December 2014

मुनासिब अंधेरा


मुनासिब अंधेरा



बहुतेरे दिनों से कुछ लिखा नहीं है मैंने
परेशान सी हंसी चेहरे पर आ जाती है
मानो मैं जिया ही नहीं इतने दिनों से
मैं एक छोटी मौत की कैद में हूं
काल है वहां
घना साया
जो मुझे पकड़े हुए है
मैं कैद हूं
एक क्रब है वो जगह
जहां ना खुद की परछांई है
ना ही कोई रौश्नी सा अहसास
मैं वहां बस गया हूं
वो मेरे घर है अब
अंधेरा ही मुनासिब है मुझे
इस चिल्लाते जहां से
रौशनी का दामन ओडे
ना जाने क्या-क्या काला है यहां
यहां सब फरेब है
वहां अंधेरा सच बोलता है
भले ही मैं गुम हो जांऊ
उस सच में
भले ही मैं बस जांऊ वहां
यहां सब वैसा ही रहने वाला है
वहां एक शांति ने मुझे जीना सीखा दिया
यहां के दिखावे ने मेरा वास्ता दोज़ख से कर दिया
यहां आइने में चेहरा देखकर मेरी दरिंदगी का अहसास होता था मुझे
वहां वो आइना ही नहीं है
वहां वो आइना ही नहीं है
                                     प्रियोदत्त शर्मा

Wednesday, 12 November 2014

राही (कविता)

उन काली रातों में मिट्टी लाल लगा रही थी
नदियों का रंग ना देख पाई
आसमान में पंछी ना दिखा कोई
चारों तरफ बस गुंजते नारे
जलते टायर
अकेले से पड़ चुके अलाव मुझे घूर रहे
मैं रास्तों में लाल रंग देख विचलित हो गई
बाजार खाली थे
कोना-कोना क्रबिस्तान था उस शहर का
अब सुना है हम यहां नही रह सकते
यहां लहू बहुत बह चुका हैं
किसी का भी घर नहीं इन जलते शहरों में
सीमाएं बट चुकी हैं
अब जाना होगा ना जाने कहां
अब हमारा कोई वतन नहीं
हम बस रास्तों पर चलते
दर बदर भटकते
विस्थापित होते राही हैं
बस राही ही हैं


                       प्रियोदत्त शर्मा

Sunday, 28 September 2014

बहुत ही दिनों से हम प्रयास की वश में हैं जहां काम की ललक है, खाने का होश नहीं, बस कंप्यूटर की स्क्रीन लगातार डेस्क पर आते जाते पेज और आफिस के खाते की चाय का स्वाद हमें बोर करने लगा है, कमरे में फैली धूल, किताबें वहीं थमी है उन पर एक अदृश्य सी धूल की चादर मंडरा रही है जो द्रिखती नही ठीक वैसे ही जैसे कई घंटे काम करने के बाद भी पत्रकारों की थकान नजर नहीं आती बस वो बिस्तर पर महसूस की जाती है,

आह  बहुत दुख रहा है शरीर ..

Wednesday, 10 September 2014

मौन (लघु कथा)

मौन (लघु कथा)

एक वक़्त  ऐसा था जब हम दोनों भावना का रूप ले चुके थे, यहाँ कुछ शेष नहीं था केवल हम दोनों बरकरार थे, बंधनों को तोड़ने के  लिए, सीमाएं लाँघने के लिए हमने मोहब्बत की
एक दूसरे को देखते, सुनते, बोलते, कहते ना जाने कितना ही समय मानो एक अरसा सा बीत गया, सहसा अब हम थे यह वाक्य निकलते ही मैं गंभीर हो जाता हूँ, समीक्षा करने का साहस नहीं है मुझमें। जब जब मैं नजदीक आया तब तब दूरी गहराती गई मानों दोनों समानंतर हों,
इतने ज़ज्बात  उमड़ने के पश्चात एक दिन सन्नाटा सा छा गया, ना कुछ कहा गया, ना कुछ सुना गया, सबकुछ गतिशील होने के बाद भी वहाँ सब थम सा गया था, अचल, अनिश्चित सा, एक अंधेरा से लिपटी  हुई कुछ संवेदनाए वहाँ मयस्सर थी। शायद हम सब कुछ कह गए थे या फिर गहराई में उतरने की कमी थी तो ही तो वहाँ मौन व्याप्त था।
               
                                                   प्रियोदत्त शर्मा















Saturday, 6 September 2014

नमूना (न कहानी, न लेख केवल आँखोंदेखी)

नमूना (न कहानी, न लेख केवल आँखोंदेखी)

कल रोहतक के पीजीआई जाना हुआ मेरे साथ मेरा मित्र रामकिशोर भी था चूँकि बीते कल पांच सितंबर का दिन था एक तो अध्यापक दिवस ऊपर से हमारे अखबार(हरिभूमि) भी  इस दिन ही स्थापित हुआ था तो चार सितंबर रात को एक बजे काम करने के बाद कमरे पर गए व  पांच को सुबह होने वाली मैराथन दौड़ में •भी ड्यूटी लगाई गई थी, इतने दिनों के पश्चात हमारी मामूल में एक परिवर्तन सा आया था, सुबह बारिश में हम अपनी आँखों में रात की नींद लिए दफ्तर पहुँच गए। वहाँ हमें बच्चों के रजिस्ट्रेशन करना व टी शर्टबाटने काम दिया गया था, बच्चे अति उत्साहित, जीतने की आकांक्षा लिए, कहते भैया  टी शर्ट देना, मुझे भी , मुझे तो आपने दी ही नहीं। लेकिन कुछ  ही समय बाद टी शर्ट खत्म हो गई क्योंकि प्रतिभागियों की सँख्या ज्यादा थी व टी शर्ट बहुत ही कम, लेकिन उनमें उत्साह की कमी नहीं थी( मिल्खा सिँह अगर दूध के लिए भाग कर जीत सकता है तो ये  टी शर्ट के लिए क्यों नहीं) मुझसे जो भी पूछता टीशर्ट मिलेगी तो मैं कहता कि जीतने वाले को टीशर्ट मिलेगी केवल इस उम्मीद के साथ कि शायद ए लालसा ही किसी को विजेता बना दे। करीब  चार घंटे के बाद हम अपना काम निपटा कर पुन अपने कमरे की ओर चल पड़े, नौ बजे होटल में नाश्ते का आयोजन किया गया था हमने नाहने के बाद मुकेश महतो के साथ होटल का रूख किया, खाना खाने के पश्चात मैं और राम अपनी आँखों का जाँच करवाने के लिए, आॅटो से अस्पताल(पीजीआई) की ओर प्रस्थान किया हमारा पड़ोसी जो एक शायर और कवि का एक दर्दनाक सा संगम है, वो वहाँ(पीजीआई) लिफ्ट का काम देखता है,  भीड को देखकर उसकी याद आई, और उसे फोन किया, वो आया। एक रसूखदार आदमी को अपने साथ लिए, जिसने आते ही डाक्टर से हाथ मिलाया और हमारा चेकअप भी तुरंत हो गया हालांकि मुझसे पहले से आए कुछ लोग वहाँ मौजूद थे जिनका नंबर ना जाने कब आया होगा, मैं इस बात को लेकर बहुत दुखी हुआ लेकिन अपना चेकअप होने के बाद मुझे दूसरों की चिंता होने लगी, उससे पहले मेरी जुबान पर एक बार भी यह नहीं आया कि बगल में बैठी में वृद्ध स्त्री जो सही से बैठने की भी जहमत तक नहीं उठा पा रही है पहले उसे चेकअप करवाना चाहिए। मेरी नैतिकता ना जाने कहाँ  खो गई।
डाक्टर ने जाँच के बाद आँखों की मासपेशियों में कमजोरी बताई, कुछ दवाइयों व हमारे उस नए दोस्त के साथ हम बाहर आए। वो कहने लगा अगर आपके पास समय है तो मैं आपको संग्रहालाय दिखाता हम दोनों वैसे भी  कमरे पर जाकर सोने ही वाले थे तो सोचा क्यों ना इसका भी अवलोकन कर लिया जाए। मैं वैसे भी विज्ञान की कक्षा में फरार ही रहता था तो हम उसके साथ हो लिए कमरे में गए एक अजीब सी गंध आ रही थी। दो मैडम वहाँ बैठी थी तो उसने हमारा परिचय करवाया ये  लोग पत्रकार हैं तो मैडम भी सक्रिय हो गई, हमें मानव की आंतों से लेकर दिल, फेफडा, आदि दिखाया हालांकि ये सब अंग हमारे शरीर में भी थे लेकिन इनको शीशे के उस पार, एक रासायनिक पदार्थ में देखना हमारे लिए एक रोमांच सा ही था। कमरे से बाहर निकलते ही एक आधा दरवाजा खुला, सामने मुझे केवल कुर्सियां ही दिख रही थी हमने सोचा शायद कोई पुस्तकालय है लेकिन अंदर जाते ही आँखों के सामने नंगी लाशें थी, लाशें नहीं डाक्टरी भाषा में नमूने कहिए। हम दोनों स्तब्ध थे राम का हाथ जेब से रूमाल लेते हुए मुँह पर पहुँच गया था लेकिन मेैं सब भूल गया वो गंध भी , जो लगातार उस माहौल को बदबुनूमा बनाए हुए थी, मैं उनके चेहरे नहीं देखना चाहता क्योंकि जीवित इंसान भाव पढने में माहिर होता है एक के हाथ पर राजु लिखा था उसका नाम होगा शायद..
 वहाँ हमने अकड़े हुए शरीर देखे, मानो पत्थर हो वो, कुछ की बाहें खुली थी, कुछ के पेट को काटा गया, वहाँ कोइ भेदभाव नहीं था, सबका कुछ न कुछ काट काट कर शायद डाक्टर बनने की कोशिश कर रहें होंगे कुछ जीते जागते लोग। इसके बाद हमने हिम्मत करके अपने कदम आगे बढ़ाए मैंने व राम ने पीछे ऐसे देखा जैसे वो उठ बैठे हो, वो अंग कटे लोग, एक रसायन की परत वाले।
आगे हम अब पोस्टमाटर्म रूम की ओर चले गए उससे आगे के लोगों के लिए मेरे पास शब्द नहीं है लिखने को, वहाँ सन्नाटा, खून, हथौड़ा, कुछ परिजनों की देह का इंतजार करते लोग बस वहाँ हम अस्पताल में स्वयं को भी नमूना महसूस करने लगे थे।
                                                                                                               प्रियोदत्त शर्मा

Saturday, 30 August 2014

आलिंगन (कविता)

आलिंगन    (कविता)

ना जाने कितनी ही पक्तियाँ अधूरी थी
कितनी ही दफ़ा  नाराजगी जताई होगी
एक असमर्थता,
परंतु मैं उन्मुक्त भाव से तेरे आलिंगन  को तैयार हूँ
फिर टूटे रिश्ते की आवाज आई
एक पुकार
चींखें सुनाई देने लगी
 जो चीरती
ये वक़्त  है
एक मरहम
पहले इतना पास आए तुम
संभावना भी न होती थी
सांसों में एक निकहत बसी
शायद तुम ही हो
 सहसा दूर होती
मैं मर जाता
तुम मेरी बांहों में चेतन से अवचेतन होती
मैं  तुम्हें कविता के भँति पाने की तमन्ना करता हूँ
जो न कभी  खत्म हो, न ही संपूर्ण
केवल अधूरे ही हम पूरे हो जाते
                                       
                                          प्रियोदत्त शर्मा


Wednesday, 27 August 2014

जड़ पेड़(कविता)

जड़ पेड़(कविता)

मुझे पेड़ों से डर लगने लगा है
न जाने कब से मैं भयभीत  हूँ
यह अब छांव नहीं देते
यहाँ फलों का भी  अस्तित्व नहीं रहा
लाशे देखी हैं जब से मैंने इसकी मोटी शाखाओं से लटकती
तब से मैं मौन हूँ भावहीन जैसे जड़
स्थिरता छाई है,
अब ये  पानी नहीं रक्त पीते
सिंचे जाते है ये इससे
हटा दो इन्हें इस जहां
ये  अब आकबत बन चुके हैं बच्चियों के लिए
यहाँ तपस्या की थी कभी  ऋषियों ने
यहाँ देव निवास करते थे
ये  बरबरता कहाँ से पलने लगी?
खेतों में वस्त्र फाडे गए थे
लाज दाव पर थी
बिलबिला रही थी वो उस दिन भी 
शायद कृ ष्ण याद आता होगा
लेकिन वो न आया
उसका कुल भी  वनिस्पतियों के कारण नाश हुआ था
वो एक तरह की घास थी
खेतों की  उस घास की भांति
शांत, परंतु हतप्रभ  व मूक भी
शैतानों के चेहरे पर भी भाव  न थे
वहाँ केवल लालसा, हवस का साया था
वो पेडो पर लाशें देखने के आदी थे
नौचने वाले शैतान
जहाँ जिस पेड़ो पर सात्विकता वास करती थी कभी
अब वहाँ गर्देने लटती देख मैं शांत हो जाती हूँ
पेड़ की तरह, कृष्ण की तरह

                          प्रियोदत्त शर्मा


Monday, 4 August 2014


पत्रकारिता में होने के कारण रात को देर से सोना हो रहा है आजकल, वैसे ये  सब लगभग तीन माह पूर्व से चलता आ रहा है लेकिन ऐसा लगता है जैसे कल ही मैंने सस्थान में कदम रखा हो, पत्रकारिता में यह मेरा पहला अनुभव तो नहीं क्योंकि मैं पहले से ही गाहे-बगाहे हाथ मारता मारता इस किनारे तक पँहुचा हूँ, राष्ट्रीय अखबार होने के नाते चुनांचे(इसलिए) मुझे डेस्क पर फेंका गया तो रात को देर से खबरों से जद्दोजहद करके ही अब घर(कमरे )पर आना होता है, इस पेशे में आने के बाद या यूँ कहुँ कि इस संस्था में आने के पश्चात मैं स्वयं को पहले के वनिस्बत ज्यादा  संवेदनशील सा मानने लगा हूँ, रिर्पोटर अपना काम जैसे तैसे निबटा कर ख़बरें भेजता तत्पश्चात हमारा काम शुरू होता बहुत से शब्द मेरी स्क्रीन पर लैंड करते, कुछ साहनुभूति के लिए , कुछेक समाचार स्वयं ही प्रोपगेंडा होती तो बहुत सी ख़बरे मुझे झिंझोड़ देती स्तब्ध में सोचता रहता मसलन वो चोरी से संबंधित हो सकती थी या कोई दुष्कर्म इत्यादि। परेशान सा थका हारा सोचता सोचता एक ही रास्ते से वही बंद दुकाने जो दफ्तर आते वक़्त खुली होती, जहाँ बच्चे गलियों में घूमने निकलते, हम दफ्तर की ओर रुख करते, रात को सब बंद होता, हमारे स्वागत के लिए गलियों के कुत्ते, बोलती रात, चमगादडे तत्पर रहती।
 
 सुबह मैंने सदैव एक कूडे वाले को कूडा उठाते, प्रेस वाले को अपने उसी एक हाथ से प्रेस करते देखा, बंदरो के आगमन के कारण बालों पर कंघा करती वो महिला अंदर भाग जाती जैसे बंदर उसकी इंतजार में ही हों, सब्जी बेचने वाले बाबा मानो पसीने की गंध के साथ अपनी जीविका चला रहे हों, चूंकि वो लखनऊ के हैं इसलिए उनसे एक रिश्ता सा हो गया, झुका कमर, एक गंजिया(बनियान) जो कुर्ते पर से झाँकतीं जैसे कोई कुछ चाहता हों, कोई मांग जो आज भी  अधूरी हो, उनकी आवाज रुंधी ही रहती जैसे कोई गम लिए बैठे बस बोलने को मजबूर हों। ये  सब मैं रोज देखता हूँ,

 लेकिन आज जो देखा वो स्तब्ध(हैरान) करने वाला था, बैड रूम की खिड़की से मेरी नज़र बाल्कानी से होती हुई  एक सुन्दर सी मोहतरमा पर पड़ी जो अपने शाही कुत्ते के साथ पॉर्क में घूम रही, उसके कोमल कोमल पैर जब घास पर पडते तो घास भी  शरमा जाती हालाँकि वो नंगे पैर नहीं थी। एकाएक मुझे समझ में आने लगा कि यह लड़की अपने शाही कुत्ते को बाहर घूमाने आई है कुत्ते की पूंछ हिलती हिलती अनायास ठहर गई जैसे कोई आकबत आने वाली हो लेकिन कुत्ते ने अपना  पेट साफ कर लिया। वो इस बड़े से पॉर्क में अपने कुत्ते को मल  करवाने के लिए लाई थी? प्रश्न का वैसे तो सवाल ही नहीं उठता,
 जहाँ शाम को बच्चे खेलते शायद सुबह बुजुर्ग लोग नंगे पैर टहलते, अब उसकी सुन्दरता मुझे भद्दी लगने लगी क्योंकि वो पॉर्क के सौंदर्य पर कुछ मैले निशान छोड़कर जा रही है जो वातावरण के  सीने में भी शायद प्रभाव  छोडते होंगे और उन खेलते बच्चों को भी खेल इसीलिए बीच में छोडना पडेगा क्योंकि उसका  पैर गंदा हो गया , वो अपने शाही कुत्ते के साथ एक बड़े से मकान में चली गई, मल वहीं पडाÞ था, बच्चे आने शुरु हो गए थे।
                                                                      प्रियोदत्त शर्मा

Thursday, 31 July 2014

लकीरे

नया-नया घर अभी  लिया है हम जैसे  प्रवासियों के लिए किराए का मकान भी  लेना ही कहलाता है, सीढीयां इतनी सकरी मानो पुरानी दिल्ली की गलियां, ऊपर दरवाजा खोलते ही गंदगी ने हमारा स्वागत किया , कुछ अखबार जो रेत की एक परत से ढक चुके थे, कूड़ा जो हमसे पूर्व रहने वाले किराएदारों द्वारा ऐसे छोड़ा गया था जैसे कोई पूर्वज अपने वंशकों के लिए एक विरासत। मैं और मेरा दोस्त एक दूसरे का चेहरा ऐसे देख रहे जैसे पहली बार हमने एक दूसरे  चेहरे के दर्शन किये हों। कुछ खाली बोतले थी जो इधर उधर बिखरी पडी थी। हम सफाई के लिए झाडू, वाईपर, बाल्टी वो भी  पानी के साथ व एक सुखे कपडे से लैस थे। सफाई की शुरूआत हमने उत्साह से की मैं कूडा उठाने लगा वो झाडू से मिट्टी समेटने के काम में लग गया, कूड़े में एक टूटी पेंसिल मेरे हाथ लगी, दो मैली रबडे जो अक्सर कुछ मिटाने के काम आती, बिस्कुट जो मानो ऐसे लगा रहें हो जैसे जल्दी जल्दी में कोई बीच में  छोड़कर चला गया हो। बच्चे की कलाकारी दीवारों पर अंकित थी। अंतहीन लकीरें, जिनका न कोई अर्थ, बिना किसी रुपरेखा के लेकिन फिर भी  जीवित हम उसे मिटा नहीं पाए।
                   
                                                            (प्रियोदत्त शर्मा) दोस्त रामकिशोर के साथ रोहतक(हरियाणा)

Sunday, 27 July 2014

युद्ध व्यवसाय है (कविता)

युद्ध व्यवसाय है  (कविता)

28 जुलाई आ गई
सौ वर्ष पूर्व
कोई मैदान न था
बस लोग तैनात थे
एक बाग में खड़े पेड़ की तरह जड़
वो एक झुंड, जो मानो इशारे का इंतजार में हो
कुछ दूरबीने निगाह बनी थी
बंकर हथगोलों से भरे थे, ठीक उस झलकते पैमाने की तरह जो कभी  बिखर जाता तो कभी  थोडा खाली सा देखता
बाल्कन प्रायद्वीप पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए
शुरू हुआ था सब
तुर्की ने स्वयं घोषणा की
शक्तियों में टक्कर हुई
बिस्मार्क नेपोलियन द्वारा किए शोषण का बदला लेना चाहता था
खुन पीना चाहता था वो
कारणवश उसे खुनी शैतान की उपाधि मिली
विडो विल्सन खारिज करने के लिए ही शांति प्रस्ताव लाया
लोग भिड़े , कोने कोने के ,जो अपने प्रतिद्व्ंधि की राष्ट्रीयता तक नहीं जानते थे
अस्सी लाख मरे इस त्रासदी में
कईयों के अंग कटे
कई दिमागी लाचार हुए
सुना है वो सोए नहीं सदियों तक
भटकते रहे , झांकते रहे , बस वो सोए नहीं
एक कर्बिस्तान से रो रहे हैं आज भी

महबृूबा का खत, मां के आंचल की पग उस सरदार के सिर थी
यहुदी ने अंगुली में अंगुठी के  बीच कुछ यादेंं छुपा रखी थी
सब कुछ छुटता गया
ये  विश्व युद्ध था
न ही कोई बुुद्धिजीवी इसे प्रथम, न ही द्वितीय की फेहरिस्त में रख सकते हैं
ये सौ साल पूर्व थमा ना था , उतरार्द्ध में उफन जाता
चल रहा है गाजा में, युक्रेन में, इराक की गलियों में भी
हर मौहल्ले में ये चल रहा है
प्रस्ताव आज भी आ रहें हैं
बस केवल खारिज होने के लिए
युद्ध निरंतर प्रक्रिया बन चुका है
एक व्यवसाय बन चुका है
जहां बसते घर उजाडे जाते
जहां किलकारियां चीखों में बदलने का काम करती
संवेदना स्वयं नाश हो जाती इस व्यवसाय में
बचता तो केवल एक हथियार
जो फिर कभी  व्यवसाय के काम आएगा
जो फिर कभी  काम आएगा
                                                                       प्रियोदत्त शर्मा

Sunday, 20 July 2014

यही मयस्सर है यहां (कविता)

 यही मयस्सर है यहां          (कविता)

त्रिशुल उठाओ
उतार दो मेरी छाती में
बाणों की सेज बिछाओं
सुला दो उसपर मुझे
करपान निकालो रेत दो मेरा गला
जिस चाकु से तुम मंत्र फूंकते हो
आज वो मेरे बदन को गोदने के काम आएगा
हां मेरी कोई जाति नहीं
यहूदियों की गोली मुझे झेलने दो
वो पीतल मेरे यकृत को चीरना चाहिए
इतनी गति होनी चाहिए उस पीतल में
वो मेरे विचारों की गति थाम सके
मेरा कोई नाम नहीं
मैं ना प्रवासी हूँ
न निवासी

इतना करने के बाद विस्मय
न रखना
अपने जिहाद के प्रति
अपने धर्म
अपने कलमे
बाईबली कहानियों पर कभी
संशय का बिंदू न स्थापित होने देना
मेरे भाव को ना समझ
तुम रखना एक विरक्त भाव
जो केवल रक्त से सना हो
कुरबानी व्यर्थ नहीं जाएगी
तेरे बाणों की
तोप के गोले की
ऐके 47 से निकलती गोलियों की
ए गोलियों की आवाज समोहित करती
रूस को
अमेरिका को
कुछ चरमपंथियों को
भाता वो माहौल
जब बिलबिलाते हुए लोग मरते
बच्चे माओं की लाशों के सामने रोते
जब वो बूढा बाप अपने जवान बच्चे के कटे अंग देखता
कुछ तो केवल घड़िया देखते
हाथ की अंगुठी देखकर
टूट जाते
पर तुम्हे क्या
कई मर्तबा देखा है तुम्हे बर्बरता की  हद पार करते हुए

तुम उनको बेनाम मानते हो
अपना हक मांगते हो
हम देते है तुम्हे इसानी
गोश्त
लहू से सना
बारुद सा महकता
पैटाशियम के खंजर में
अटका वो टुकडा
जानवरों के लिए यही मयस्सर है यहां
                                         

                                            प्रियोदत्त शर्मा

एक बच्चा

रास्ते पर चलता चलता मेैं अक्सर एक अंतहीन सोच में डूब जाता, दफ्तर की ओर जाते मुझे न तपते सूरज की सूध रहती, न ही आसपास घटित होती उन घटनाओं की जो कभी कभी अनायास ही घट जाती। पर उस दिन समाचार सुनने के बाद मैं सीधे दफ्तर को निकला ही था कि रास्ते मैं एक बच्चा खेलता दिखा। जिसकी आंखों में ख्वाहिशें पल रही कि भविष्य सुनहेरा होगा ठीक गोरेया के पंखों की तरह, जो आसमां की ऊंचाइयों को अपने मात्र छोटे छोटे पंखों से लंबी दूरी तय कर लेती।वैसे ही उसके कदम थे, छोटे छोटे 
चूंकि मैं समाचार देखते समय यह देख कर आया था कि एक छोटा बच्चा भी उस बम का शिकार हुआ जो इज्राइल ने फिलीस्तान पर गिराए थे। मेरी कल्पना उस ओर सोचने लगी मैं फिलीस्तान में था सामने वो बच्चा और चारों तरफ सिर्फ तबाही तबाही,कुछ खिड़कियां ,टूटी छत । आंखें स्तब्ध हो गई, रक्त ठहर गया और मेरे सामने वो बच्चा उस गोले का शिकार हो गया, मैं देखता रहा फिर दफ्तर पर आकर समाचारों का सिलसिला शुरु हो गया। बच्चे मरते गए हम देखते गए, उनके भविष्य नहीं अपितु हम अपने समय को लेकर चिंतित नजर आ रहें हैं।
छोड़ दो उन्हें
नहीं उनका कोई कसूर
उतारना है तो बारुद
मेरी देह में उतारो
मै उनका हितैषी हूँ
मेरी कलम उनके लिए है
ये कागज उनके लिए है
ये  जज्बात उनके लिए है
                       
                                                    प्रियोदत्त शर्मा

Wednesday, 16 July 2014

ये कैसी मामूल है
मै समझ नहीं पाया
यहां कभी झुकना
थोड़ा टूटना
रोशनी से भी जलना
ये कैसी मामूल है
मै समझ नहीं पाया

Tuesday, 15 July 2014

एक निश्चित अवधि (कविता )

एक निश्चित अवधि (कविता )

CXÀf SXûªf ¸fZSXe ÓfbhÓff»ffWXMX ±fe
CXÀfÀfZ ´fWX»fZ ½fû AWXÀffÀf
AfhJûÔ ¸fZÔ AfhÀfc
WXûÔNXûÔ ´fSX Jf¸fûVfe
°fZSXf ¨fZWXSXf PÞIYf ±ff
EIY ¦fÔभीeSX°ff ÀfZ,
ÀfûWX¶¶f°f AüSX ¸fûWX¶¶f°f IZY ´fdSX¯ff¸f EZÀfZ WXe WXû°fZ W`ÔX
½fWXfh d½f¹fû¦f WXû°ff W`X
AVffÔd°f भी  A´f³ff AfdVf¹ff³ff ¶f³ff »fZ°fe
IbYLX ¸fªf¶fcdSX¹ffÔ AüSX WXQZÔ Àfed¸f°f Àfe ´fi°fe°f WXû³fZ »f¦f°fe
EIY A½fd²f IZY Àff±f
WX¸f J°¸f WXû ªff°fZ

                                d´fi¹fûQØf Vf¸ffÊ

Thursday, 10 July 2014

सांप्रदायिकता का गुबार (कविता )

सांप्रदायिकता का गुबार (कविता )

ना जाने कितनी चींखे उठी होंगी
वियतनाम में
हिरोशिमा में
नाकासाकी में
गगन उस दिन धुएं के रंग में रंगा था
रक्त से धरती का आंचल सना था
आसमान के असली रंग की तरह
उस रोज होंठ नीले थे लोगों के
मछली की तरह तड़प रहे थे सब
जल नहीं मयस्सर था वहां
सबकुछ इतनी जल्दी हुआ
समझ ना सका वो देश
वो धरती श्मशान बन गई
वहां जला नहीं कोइ
बस तड़पते रहे
सोचता हूं अक्सर
कि क्यों  इतनी चींखे
नहीं कर पाई होगीं मुकाबला
उस गुबार का
जो हवा में शैतान की तरह तैनात था
चीर नहीं पाई  वो चींखे
 फटते जिगरे की भी  आवाज
 शुन्य साबित हुई
परमाणु अकेला नहीं होगा
वहां कुछ शैतानिया होंगी
वहां कुछ नीतियां होंगी
सांसों में जाकर उफान पैदा करता
मैने ऐसी बातें वियतनाम की उस बच्ची से सुनी हैं
जापान के लोग आज भी  परमाणु और उफनती अधड़
सांसों के बीच जीते हैं
चिली में ग्रासिया ने  बर्बरता का इतिहास लिखा
पाब्लो की किताबें आज भी  वैसे ही चीखती हैं
मेरे कानों में
वो जिंदा हैं
कई बार अफगान से होती हुई
पाकिस्तान को मारती
भारत भी  आई
परमाणु नहीं यहां मौजूद था
यहां तो हर हर महादेव
बिस्मिल्लाह अल रहमान
जो बोले सो निहाल
जैसे नारों ने मिलकर
यह काम किया
जो कभी  रसायनों के तर्ज पर होता था
आज  धर्म के बिनाह पर टिका
कालांतर से अब तक  तरिके बदले
लड़ने के, लड़ाने  के 
लेकिन लाशें वहीं थी
रक्त उसी तरह लाल था
नीतियां भी  वैसी ही थी
मरने वाले भी  वही
औरतों के कटे वक्ष
बच्चों के अलग धड़
यही देखे
सांप्रदायिक्ता का जलता टायर
उस सिख के गले में था
इसकी जड़ में कुछ पंडित
कुछ ईमान जकड़े थे
जो आज भी  गुबार उठाने के लिए तैयार हैं
बस एक बार बोलो हर हर महादेव
बिस्मिल्लाह

                प्रियोदत्त शर्मा
 



Friday, 27 June 2014

अलविदा (कविता)

  अलविदा (कविता)

कई बार प्रतीत होता
मै सीमित हो जाता हूँ
ठीक पुष्प की सौगंध की तरह
पेड की छाया की भांति
तेरे चेहरे का उस एक इंच मुस्कान के जैसे
सब कुछ हुआ एक ललक से
अब वो खत्म हुई तो
नज्म में ही तेरा वजूद है तो
क्यों तलाश कंरु प्रकृ्ति में

न जाने क्यों अब तेरी तस्वीर नहीं भाती
पर शहर का जिक्र आते ही
मै झुंझलाहट से लैस सन्नाटे को महसूस करता
ठीक वैसी ही माहौल जैसा युद्ध के मैदानों में
उसके खत्म होने के पश्चात होता
संमभोग के बाद दो जिस्मों के  बीच यही
सन्नाटा पसरता है ना
वियोग जैसे कभी  श्मशान में
कभी  मेरे अंर्तमन में
बस वो छा जाता
यह सब लगातार के साथ क्षणिक भी 
मौसम के बदलाव के अनुसार बदलाव
कभी  कभी तो  रात बोलती
तो मैं कापने लगता
रात मुझे अपनी बांहों मे ले लेती
ठीक तेरी बातों की तरह
उस आगोष में  मैं सो जाता
गुम और गम के साथ
अब रात बोलती नहीं
यदा कदा जिंदगी चलती रही तेरे अभाव में
लेकिन एक दिन आहट हुई
अंदर से
वही अंदर जिसको चिकित्सक नहीं जान पाए
वैज्ञानिक उसी अंदर में डूब गए
जैसे कोई बेजान पत्थर डूबता
प्रकिया जारी है इसी अंदर को खोजने की
ऐसा शोधकर्ताओ का कहना है
उस पल यहां न कोई आवाज थी, न कोई सन्नाटा
बस आहट थी
किसी के कदमों की
ठीक वैसे ही जैसे पेड़ के अंदर से कोई पक्षी चहचाता हो
बस तेरी अनुभूति उसी आहट में सम्माहित होती गई
पानी किसी में मिलता
तो वैसा ही हो जाता
वैसे ही तू आई
विरक्त भाव के साथ आज भी  मैं
रास्ते पर था
पर मंजिल स्वयं दर पर
शून्य का तरह मै उसे समझ नहीं पाया
सहसा मेरी सांसे थम गई
निगाहें एकाएक पत्थर हो गई
वही पत्थर जो डूबने के लिए बना है
समय ने तुझे भी खड़ा  कर ही दिया
दर पर
तेरी विस्मयकारी आंखों के साथ
मेरी धडकने मिल जाती
क्यों आई तू इस पंक्षी के पास
मै अब नहीं उड सकता
मैं कट चुका हूँ
दिल पर हाथ रखे एक इंच मुस्कान के साथ
बस अलविदा


                                                       प्रियोदत्त शर्मा

Wednesday, 18 June 2014

लाल रंग (कविता)

  लाल रंग (कविता)

क्या काफी है केवल टोपी मुस्लमान की पहचान के लिए
क्या हाथ पर छपा ओम का चिंह ये दर्शता है कि तुम हिंदू हो
सिख की पग़ड़ी ही उसकी  मौत का कारण बनी थी
उस दौर में जब
बडा पेड़ गिरा था
कई पौधों की जडें लुप्त हो गई थी
लेकिन उससे  भी पहले
सदिया लहु पी चुकी  है
पानी नहीं
 वही लाल लहु
  जिसे देखते आज तेरा मेरा जिगरा विचलित हो उठता है
देख आज भी  शिया और सुन्नी हथियार के साथ है
बाबरी के नाम पर हिंदू भी  तैयार रहता है
रक्त बहाने को
शामली में बैठे वो लोग
जो बरसों से विस्थापन झेल झेल कर बंजारे हो गए है
क्यों कभी  सिख तो कभी  मुस्लमान कभी हिंदू तो कभी  कोइ काला गोरा
अपने अदम(अस्तित्व) को साबित करने के लिए खुंखार बनता है
जानते नहीं है वो चरमपंथी की लाल हमेशा
लाल ही होता है
चाहे लहु हो या किसी मां का बच्चा
आज वही हो रहा है खाड़ी देशों में
जो पहले कभी  हमारे तुम्हारे मुल्कों में हुआ था
वही लोग बाग सदैव ना जाने क्यों
मानव की पहचान के लिए धर्म की आड़ लेते है
कहां है उनकी संवेदना , कहां गया वो इश्फाक(दया भाव )
जिसकी कहानियां कुरान में
जिसके अध्याय गीता में
व जिसकी चौपाई गुरुग्रंंथ साहिब में लिखित है
बाईबल भी  तो सौहार्द का ही संदेश देता है
इतनी अवमानना करने के बाद
क्यों कर रहे हो बर्बरता की पालना
 हम पहले है हमारा धर्म बाद में
यह कोई समझाओं उनको
याद रखना की लहु बहाने वाले का जिगरा होता है
न की काटने वाले का
कमजोर विचलित होकर गाहे बगाहे हाथ मारता है
 तूम काटते जाउ
हम कटते जाएंगे
हंसी ही होगी हमारे चेहरों में
उस अंत समय में भी  हम भीख नहीं मांगेगें
अपनी बच्ची की जान की
जानते हो वो बच्ची भी  तुम्से नहीं डरती
तुम्हारी बंदूकों से
उस बदहवासी आवाज से
रुआंसे तुम लग रहे हो
शायद तुम्हारा मन नहीं भर रहा हमारी लाशों से
तो वो देखों लोगों का जखीरा आ रहा है
कटने के लिए
उठाओं अपने हथियार और देख लो हमारे लहु के रंग को
शायद अब हमारा लहू का  रंग शहीदी के रंग में रंगा हो
और तुम्हारे चेहरे पर खुशी लौट आए
                                                                                        प्रियोदत्त शर्मा

Sunday, 15 June 2014

मै आज भी जल रही हूँ (कविता)

  मै आज भी जल रही हूँ (कविता)

तेरे द्वार आने पर मुझे क्या मिला
तेरी पत्थर आँखे भी मेरे शौहर के ही भांति है
हालांकि मेरा जिस्म भी अब पत्थर हो चुका है
तू भी एज़ाज में मुझे आंसू देता
तेरी प्रार्थना करने के बाद
अब मुजाहमत सी होने लगी है जीने में
इस समाज के रीति रिवाजों की तरह
तू भी एक रु ढ़िवादी विश्वास है
सारी उम्र में तुझसे मांगती रही
एक साथ
लेकिन दिया तूने मुझे
अपनी ही तरह संवेदनशील
बचपन से मैं तेरी पुजारी थी
नारी हूँ ना दामन बस थामती हूँ
और थमाती हूँ
पारर्दशीता नजर आती थी मुझे
तेरी तासिर में
तेरे दीद ही मुझे
आस्तिक बनाते थे
परंतु तू भी वैसा ही निकला
तेरे दर पर मैं आज से नहीं
सदियों से मरती आ रहीं हूँ
मछली सी तड़प है
जो मुझे पल पल मारती है
बस मुझे सुकून दे
मालूम है कि तू अस्तित्वहीन , भ्रम है
मुझे विस्मय न होगा
क्योंकि तू भी तो पुरुष है
तेरी फितरत भी वैसी ही होगी
शायद तू भी भूखा है
प्रार्थना का, सेवा का
जानकी को तूने मिटा दिया
वो जानकी जो तिनके के सहारे
रावण से बचती है
जिसके शौर्य के आगे आग भी दम भरने लगी
तेरे शक से वो विचलत हो उठी
ठीक मछली की तरह
तेरी मर्यादा फिर भी बची रही
फिर मेरी क्या बिसात
बस मैं एक नारी ही तो  हूँ
अहिल्या के भांति
मै भी पत्थर हो गई
उसी जानकी की तर्ज पर
मै आज भी जल रही हूँ
और तेरी मर्यादा अभी भी बरकरार हैं
                                                       प्रियोदत्त 

Wednesday, 11 June 2014

ख़ालिस कौन (कविता)

  ख़ालिस कौन   (कविता)
मैं तेरे दीद को तरसता रहा
ठीक एक चकोर  की तरह
तुने दीवाना बनाया था मुझे
अपनी उस आह का, स्वरुप का
छल तो कतई नहीं हो सकता
तुम केवल मुझे परवान पर पाना चाहते थे
क्या है तेरी पराकाष्ठा इससे वाकिफ़ था मैं
तेरी तस्लीम(अभिनंदन) में थी मेरी आँखे, मेरे लरजते(हिलते) होंठ
मेरा इकबाल(सोभाग्य )था तेरा रुतबा, तेरा अस्तित्व
तेरे अश्फाक(सहारे) के लिए मेरे पास बस एक रात है
जज्बातों को जानने के बाद हमने देह को जाना
कुछ जज्बात तो नष्ट हो गये उस मिलन में
कुछेक के लिए जगह ही नहीं बची
बस एक प्रश्न था कि
ख़ालिस (पवित्र ) कौन?
                                       ( प्रियोदत्त शर्मा)



Saturday, 7 June 2014

प्यार की फितरत (कहानी

  प्यार की फितरत (कहानी)

बीते कुछ दिनों से पकंज को नींद नहीं आ रही थी, वैसे तो वो घोड़े बेचकर सोने की आदत से ग्रस्त था पर अब प्रतीत होता कि घोड़े बिक चुके है। उसके घोडे  खरीदने वाली अर्थात उसकी नींद चुराने वाली और कोई नहीं अपितु उसकी दोस्त माही थी।
 पहले तो उसने माही से नींदों में बात की , फिर काली काली रातों में जगी आँखों से गुफ्तगु होती रही, उसी जागी जागी सी नींद में वो माही को पा चुका था लेकिन माही उसे केवल अपना अच्छा दोस्त मानती थी पर पंकज उसे एक अहौदा देता, प्यार देने का ही तो नाम है। अपने साथी चाचा से यही सुना था उसने , दरअसल चाचा उसका दोस्त था जिसका असली नाम कोई कोई ही जानता जब से उसकी मोहब्बत किसी और की हो गई है तब से चाचा रात के अंधेरे को दूर करने के लिए शराब का सहारा लेता। जाति अलग होने के कारण चाचा का प्यार भी  अलग हो गया। पंकज को केवल इतना ही बताता कि मैं उससे मिला था शादी से पहले, ताकि उसके दिल की बात जान सकुं। मैंने उससे पूूछा पंकज कि तू क्या चाहती है? जवाब पता क्या आया ईज्जत तेरी भी  और माँ बाबा की भी , बस इतना बोलते ही चाचा चुप मानो आज  भी ईज्जत की परवाह पड़ी हो, चाचा की खामोशी ही बयान करती कि प्यार त्याग का ही तो नाम हैं।
धीरे धीरे पंकज ने कॉलेज में अपने दोस्तों के साथ रहना कम कर दिया और एकांत से नाते जोड़ने लगा। माही के दूर होते ही उसके दीद को तरसता पर जब वो सामने आती तो गर्दन इधर उधर घूमाता, बगीचे में पेड़ों के पीछे से निहारने का काम वो बखूबी करता। माही को देखते ही वो पेड़ के साथ पेड़ बन जाता। न जाने क्या हुआ था उसे पिछले एक वर्ष से कोई मतलब नहीं था उसे माही से... फिर ये अचानक  ऐसे सवाल उसे दुखी नहीे करते वो नकारता इन सवालों तलाश तो उसे केवल और केवल माही के प्यार की ही थी।
एक दिन निशा से उसने माही का फोन नंबर लिया रात में हिम्मत कर फोन किया न जाने इतना हौंसला अचानक कहाँ से आ गया उसमें शायद ये उसी माही का कमाल था जो रातों में उससे बातें करती ठीक एक कल्पना की तरह जिसपर वो अपने वजूद से ज्यादा यकीन करने लगा, ये विश्वास उसी ने पैदा किया।
फोन पर अपना नाम बताने के बाद उसने एक घबराऐं हुए अंदाज को एकाएक त्यागते हुए कह दिया कि मुझे तुम्से प्यार हैं, मैं कई रातों से सोया नहीं हूँ तेरी वजह से, दोष मंडता हुआ वो माही को बच्चों की तरह लगने लगा। माही ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बल्कि कहा कि कल हमें मिलना चाहिए।
तपाक से बोला हाँ कल मिलते हैं, इस खुशी में माही की प्रतिक्रिय भी  जाननी भूल  गया। अगले दिन दोनों मिले पंकज खुश था लेकिन माही की आँखों में वो नहीं देख पाया। उसकी भावनाओं का आदर करते हुए माही पंकज को अपने अतीत की और ले गई।
उसने उसे पहले प्यार के बारे में बताया जो उसे धोखा दे गया था,
- पंकज मैं और धोखे बर्दाश्त नहीं कर सक ती, पंकज क्या हम अच्छे दोस्त बनकर नहीं रह सकते वो बोला क्यों नहीं सवाल उसके पास कोई भी  नहीं था, निहता था बिल्कुल, न कोई चालाकी,न कोई फहरेब बस केवल प्यार से लैस आशिक।
- आज से हम दोनों दोस्त माही ने ये कहते हुए हाथ आगे बढ़ाया
- उसने हाथ मिलाते हुए कहा जरुर माही
  धीरे धीरे दोनों की फोन पर खूब बातें होने लगी, समझने लगे वो एक दूसरे को
एक दिन माही ने उसे कहा कि तुम सब कुछ साफ साफ कहो क्या आज भी  तुम ..
- इतना बोलते ही पंकज का प्यारनुमा ज्वालामुखी फट गया लगातार वो बोलता ही जा रहा था कि मैं तुम्हे धोखा नहीं दूंगा माही भावुक हो गई माही भी  अपना दिल हल्का करना चाहती थी।
- वो बोली कि वो मुझसे बहुत प्यार करते हैं
- पंकज जानबूझकर फोन पर हैलो हैलो करने लगा जैसे ये हैलो उस वाक्य को शायद बदल दें।
- माही बिना कुछ सुने वो खुद से भी  ज्यादा चाहते हैं मुझे, मैं उन्से प्यार नहीं करती बल्कि उनके प्यार से प्यार करती हूँ
- पंकज सोच रहा था कि धोेखें खाने के बाद इंसान कितना मजबूत हो जाता हैं।
- माहीं बोली वो मुझसे उम्र में 12 वर्ष बड़े हैं
- यह वाक्य पंकज के कान में तिनके  की तरह चुभे , संपूर्ण ब्रहमांड में यह गुंज रहा था। माही के रोने की आवाज ने पंकज को झिझोड़कर रख दिया वो आँसू दिख नहीं रहे थे लेकिन पंकज कहीं आज उन आसूओं के आब में बह न जाए
- पंकज बोला माही मैं तुम्से कल मिलना चाहता हूँ फिलहाल तुम चुप हो जाओं
अगले दिन मुलाकात हुई फोन पर माही ने जो बात बताई थी उसको लेकर वो सोच रहा था, वो सामने थी
माही ने कहा कि परम एक व्यवसायी हैं
पंकज तो अब प्यार करता था उससे काले रंग के चश्में से उसने अपनी आँखें ढक ली
माही क्या तुम्हारा उन्से शादी का प्लॉन है?
हम पाँच साल से साथ हैं पंकज इसको लेकर बहुत बात हुई लेकिन हम शादी नहीं कर सकते
हमारा समाज के कुछ कायदे है जिनकी दीवार लांघी नहीं जा सकती ,पंकज केवल सुनना चाहता था, एक जिज्ञासा थी उसके अंदर ,
उनकी  शादी हो चुकी है और एक बच्चा भी  हैे, उनकी पत्नी पहली रात को ही उनके दिल से दूर हो गई वो किसी ओर से प्रेम करती थी, उसने उनको बताया तो वो स्तब्ध रह गये, इधर पंकज का भी  यही हाल था।
माँ बाप की ईज्जत के लिए शादी का बंधन उन्होने बांध लिया था लेकिन दो महीने बाद परम ने अपनी पत्नी के प्रेमी से उसका विवाह करवा   दिया, बच्चा उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही  अनाथालय से गोद लिया हैं।
पंकज भूल  चुका कि वो माही को प्यार करता है, बस यह सोच रहा था कि क्या दूसरी बार परम समाज द्वारा निर्मित दीवारोें को पार कर पायेगा,
पंकज इस अधुरे प्यार को ही प्यार की फितरत मान कर माही के आँख से टपकते आंसू  पौंछता रहा।    
                                                                                     (प्रियोदत्त शर्मा)

Friday, 6 June 2014

इश्क शिव का भी रुसवाई से (कविता)

 

इश्क शिव का भी रुसवाई से (कविता)

अच्छा लगता है अब त्याग
ठीक दूर बसती महबूबा के लरज़ते होंठों की तरह
अब आँखे पढने लगी है
किसी  किताब को
एक खामोशी का अवलोकन कर रहीे है
शायद अब यही बाकि था
पहले नाकार कर ,
उस एहसास का मज़ाक  बनाकर
गलती तो हां तूने की हैं मेरी जान
लेकिन तूझे इससे ही तो जीना आया
दूरी को भी पीकर तू
जी रहा है दिल सीकर तू
मेरे अंजुमन से जुदा होकर
शायद अब खुद के लिए ही होगा तू
लोग तो निग्रा(केवल देखने वाले) है ही
उनकी आखों को देख मत
तेरा आइना तेरी छांया है
जो लुका चुप्पी खेलती है
तेरी  तकदीर ,तेरा जिस्म
छांया से दूर होते ही तू मेरी बांहों में टूट जाते  है
बिखर मैं भी जाता हूं तेरी दूरी से
एक सीमआब(पारा धातु) की तरह
रक्स करता हूँ तेरे वियोग में
ठीक शिव की भांति
शिव की अंधंगिनी की तरह
तू मेरी है पर
वियोग मेरा नहीं
वो अगालते मेरी नहीं
वो शरीर  मेरा है
पर ख्वाहिशें मेरी नहीं
ठीक उस शिव की तरह
जिसकी जटाओं में बसी गंगा
उसकी नहीं
जिसके सिर पर सजा चांद
उसका नहीं
तांडव तो लोगों की देन हैं
वो तो तडपता हैं
उसी वियोग में
केवल उसको शिवानगी ही शांत कर सकती हैं
वो उसका अंग है
उसके दीद के लिए वो तडपती नहीं
वो समाहित है उस
तीसरी आँख में
वो बसती हैं
 उसकी देह की भस्म में
परंतु शिव फिर मचलता हैं
धरती कापंती हैं
वियोग है, इश्क है उसे, मुझे
ठीक  तेरी और  शिवानगी की रुसवाई की तरह
                                           
                                                               प्रियोदत्त शर्मा
                                           







Thursday, 5 June 2014

आग से खाक होता (कविता)

  आग से खाक होता (कविता)

परवान न चढे वो इश्क ही नहीं
धूल न उढ़े वो आंधी कतई नहीं
चलता चलता अगर कोई लम्हा रुक जाए
तो समझों यह एक  साजिश होगी 
उस पल की 
जिसको तुने ठुकरा दिया
जलन तो होनी ही है अब ,तेरे पैरों में
यही रास्ता था वो जिसपर तू दौडा नहीं 
एक अश्फाक के लिए भटकता 
पथ से भी  बिछड़ गया तू 
लेकिन वक्त अब चाहता हैं 
कि तू मुतरिब की तरह साज को गाए
निकहत की तरह फिजा में घुल  जाए
वक्त चाहता है 
तू दौडे
एक जलन के साथ
ज्वलनशील बन जाए
राख हो जाए काटें तेरे ताप से
खुद  ही की  आग में तू भी  जलकर खाक हो जाए

Wednesday, 4 June 2014

बस एक आस(कविता)

तू मेरी तकदीर में नही
शायद ये गुस्ताखी होगी कायनात की
वो पहचान ना पाई
एक अबियत है तू
मैं एक शायर हूँ
तू किरण है
मैं वो धरती 
जिसपर तेरा अस्तित्व स्पष्ट होता है
तेरे ताप के निशान में झेलता हूँ
ये अनुभूति करवाते है
तेरे होने की
मैं घास हूँ
तू वो नम है
सोंधा सोंधा घूँघट है तेरा
हमारा एक होना जरूरी है
वैसे ही जैसे शिव और गंगा एक है
तेरे रंग में मैं बनारस हो जाता हूँै
कुछ तजुर्बे हमे अलग करते
लेकिन तेरे वो निशान
मुझे झूने का एहसास करवाते
और मैं फिर डूब जाता
उस आंनंद में
एक अलग दुनिया में
खो जाता मैं कहीं
ये खोना ही पाना है तुझेै
अलग होना विभीषीका है इस संसार के लिए
उस गगन के लिए जो हमारी बदोलत है
एक अफवाह रचता है वो
वो भी तेरा आशिक ै
लेकिन मैं आशिक नहीं
तेरा साया हूँ
जिस्म हूँ
रूह हूँ तेरी
एक त्रासहै उसके मन में
पर मैं बस एक आस पर जिन्दा रहता हूँ

(बनारासिया) 

Tuesday, 3 June 2014

झल्ला जाता हूँ (कविता)

 
रात की बारिश , साथ देता तूफान
न जाने क्यों  , अंधेरे को और घना कर देती है
एक गहराई का आगमन होता हैं
परछाई के साथ उल्लु रक्स (नाच) करते हैं
इस रात पर कविता लिखता मैं
झल्ला जाता हूँ,

आँख जब उन तारों की
आफताब से जो जा मिलती हैं
काली घटाओं के साथ, सुनसान रास्तों पर
एक खामोशी जब पसरती हैं
तो उसमें वीभत्सा नहीं
केवल मार्मिकता को देख मैं
डूब जाता हूँ,
वीरान उस पथ पर भी , बिना किसी साथ के
अकेले ही निकल जाता है राही
क्योंकि वहाँ बस रात बोलती है
राही चलता हैं,,, बस चलता  हैं
और मैं फिर झल्ला जाता हूँ.. डूब जाता हूँ
                                                     
                                                                   d´fi¹fûQØf Vf¸ffÊ


Monday, 2 June 2014

जवाब की तलाश में (लघु कथा )

   सहमी सी मौत के कारण वो यमराज के पास  वो ऐसे ही पहुँची, कपड़ों का  हाल बुरा था, चेहरे पर बर्बरता के निशान थे। यमराज के साथ चित्रगुप्त भी  हैरान था। क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई यमलोक को देखकर चिखे चिल्लाएं न।
आखिर इस बच्ची के साथ क्या हुआ है चित्रगुप्त, यमराज ने सवाल किया
-चित्रगुप्त ने मानवजीवन    बहीखाते की ओर नजर डाली और तलाशने लगे उस बच्ची के अतीत के बारे में थोडी देर के बाद चित्रगुप्त ने कहा कि महाराज इस बच्ची के साथ बहुत गलत हुआ है। इसकी असमत  लूटी गई है।
एकाएक वो चींख पडी , नहीं ...नहीं
असमत   मेरी नहींं.  उन माओं की तार तार हुई हैं जिनकी कोंख ने नौ महीने तक उन बाशिंदों को जगह दी। असमत  मेरी नहीं ...उस बाप की लूटी है जो सोचता था कि अपनी बिटिया को अफसर बनाऐगा। क्या दोष था मेरा ? यमराज अफसोस में था।
क्या तुम केवल देखने के लिए बैठे हो? उसने यमराज से पूछा
लोग आपकी जमात के कुछ को देवी देवता कहते है ,पूजा करते है आपकी , आस रखते है आप जैसे देवी देवताओं से
लेकिन आप अनादर करते है.
हमें यहां स्वर्ग नहीं चाहिए बस आप धरती को स्वर्ग बना दीजिए । आप क्यों भेजते है बेटियों को वहां ... क्यों भेजते है आप.…  वो रो पडीÞ,, बहुत दर्द   देते है हमें लोग.. कहीं आप इसलिए तो नहीं भेजते कि आप ही जैसी मर्द जात उसका लुत्फ उठा सकें?
यमराज उस दिन से उत्तर के लिए भटक रहा हैं और वो आज भी  जवाब के इंतजार में हैं

Sunday, 1 June 2014

तिराहा (लघु कथा


जैसे ही मीना ने उसे फ़ोन कर बताया कि शीतल वो तेरी याद में आज भी परेशान है'बस एक बार उससे बात कर लो । उसका नाम सुनते ही शीतल सिहर गई'बदन से कंपकपी सी छुटने लगी' ऐसा लगा जैसे किसी के सपर्श ने उसके अक्षत बदन को छु लिया हो।शीतल के समक्षसारी बातें एक दृष्य की तरह चलने लगी। अब वो भी परेशान ' लेकिन खिड़की से नाना जी को अपने कमरे की ओर बढ़ते देखा तो सब भूल गई
उसने मीना को शीघ्रता से कहा'आप फ़ोन रख दीजिये'कुछ नही हो सकता'हम उससे बात नही कर सकते'सब रास्ते बंद हो चुके है' बहुत बुरा हो जायेगा
इतने वाक्य वो एक साथ तपाक से बोल गई ठीक पागलों की तरह
मीना कुछ ना बोली शिष्ठाचार के तहत फ़ोन रख दिया।
फ़ोन कटते ही शीतल सोच में'मीना भी उसी बोध मे
थोड़ी देर बाद मीना ने प्रियदर्शन को फ़ोन किया और सारी बात बता दी' सहसा वो भी सहम गया ' उसकी चश्म ठहर गई

तीनो के कानो में फ़ोन कटने की वो आवाज़ थी' आसपास सुनसान' कुछ प्रशन तॆनात थे' समृति के कुछ चित्र आज जैसे किसी तिराहे (तीन रास्ते) पर पड़े हो
(बेदखल आशिक)ं

वक्त-वक्त गहराता सन्नाटा


मुझे अंजान जानते ही साडी के एक छोर में उसने गांठ मार ली थी, जैसे कोई मुल्यवान चीजÞ को वो मुझसे छुपाना चाहती हो। सड़क पर गाड़ियो की आवाजाही उसकी और मेरी बातों में खलल डालने को बेताब थी तेज़ चलते वाहन मानो एक इच्छा को कौंधते हो। हस्तशिल्प का कार्य करते करते हाथ की बुआईयों में कुछ कटाव थे ठीक वैसे ही जैसे सड़क के  किनारों पर बारिश की बदौलत कुछ दरारें। मुझे उसकी आँखों में दर्द नहीं दिखा। लेकिन बारिश तो उन आँखों में भी हुई थी।
    
  उस रास्ते से जाते वक्त न जाने क्यों में अचानक थम गया था शायद उस किनारे पर पडी   हस्तकला की  वस्तुओं ने मुझे रोक लिया, यह हुनर ही था कि मैं उसके पास जाकर कुछ जानने को इच्छुक हुआ। मेरी जिज्ञासा ने मेरी गति को एक ठहराव दिया और तपती गर्मी में भी मेै उसके पास ठीक उसी तरह बैठ गया जिसप्रकार वो जमीन की छाती पर बहुत ही सुकून के साथ बैठी थी, उन दफ्तरी कुर्सीओं में वो अहसास कहाँ (यह प्रश्न मेरा था), उसके बिल्कुल सामने बैठे हुए, मुझे उसके चेहरे पर आँसु की एक सुखी लकीर दिखी जो उसके रोने का बयान कर रहीं थी। 
  
बैठते ही मैंने उससे पूछा कि आप यह लकड़ी की कुर्सी, सोफे क्या स्वयं बनाते है? मेरे सवाल को उसने बहुत सहज लिया।
-नहीं यह हम असम से लाते हैं।
-कितने समय के पश्चात आप असम जाते है?
-हम नहीं जाते सामान ट्रक से आता है, कई-कई बार हमारा सामान भी पकडा जाता हैं
  उसकी आवाज में भारीपन आ गया मानो किसी ने पत्थर रख दिया हो
-आपको यहाँ इस सड़क के किनारे रात में हमारे सिपाही तंग नहीं करते?
-नहीं, कभी नहीं
-चोरी वोरी हुई कभी
-अभी तक तो नहीं हुई
देश की कानून व्यवस्था और चोरों के नैतिक मूल्यों पर मुझे गर्व हुआ। वैसे भी लेखक इनके काम पर लगातार नजर रखे हुए है फिल्मों से लेकर वास्तविकता में पुलिस का देरी से आना और चोरों का मजबूरी में चोरी करना लेखक के मन में दोनों वर्गो के प्रति संवेदना का बीज बौता हैं।
मैंने उनसे उनके पति के बारे में पूछा तो जवाब आया कि सामने दारु पीकर जो पॉर्क की हवा में सपने ले रहा है, वो मेरा पति है। (दारु पीकर मारना, गाली देना इनका धर्म हैं)
आपके बच्चे ?
-वहीं रहते है गांव में, पढते है तीनों
अच्छा ...
सामने उनका पति अब उठ गया था, लेटे लेटे ही अपने धर्म का पालन कर रहा था। मेरे कदम भी सीधे हुए, खडा होकर चल दिया.. बस एक ही बात निकली कि वक्त वक्त की बात है। सड़क पर दौड़ती गाड़ियों ने हमारी बातों में खलल नहीं डाली बल्कि सन्नाटा था वहाँ जो उसके हर बयान से गहराता था।
                                                                                              (प्रियोदत्त शर्मा)
                                                                                             लेखक कदापि नहीं

Monday, 12 May 2014

MERI punjabi kawita = main hi haan

मैं ही हाँ
पंजाबी कविता
(कमला लेखक )

ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਦਿਲ ਨੂ ਸੰਭ ਕੇ ਰਾਖਿਆ
ਸੰਵਾਰ ਕੇ ਰਖਿਆ 
ਇਕ  ਤੇਰੇ ਦਿਲ ਤੋੜਨ ਦੀ ਫਿਤਰਤ ਦੇ ਖ਼ਾਤਿਰ 
ਇਕ ਤੇਰੇ ਰੁਸਾਂਨ ਦੇ ਵਾਸਤੇ 
ਮੈਂ ਸਾਰੇ ਜਹਾ ਤੋਂ ਰੁਖ ਮੌੜ  ਲਿਆ 
ਮੈ ਤੇਰੀ ਆਂਖਾ ਤੋਂ ਬ਼ਾਹਾਰ ਨਾ ਨਿਕਲਿਆ 
ਇਕ ਜਹਾਂ ਸੀ ਮੇਰਾ  ਉਸ  ਗੂੜ ਵਿਚ 
ਮੈਂ ਸਮਾਂ ਗਿਆ  ਤੇਰੀ ਮੋਹਬ੍ਬਤ  ਵਿਚ 
ਜਿੰਦਾ ਹਾਂ ਮੈਂ ਤੇਰੀ ਮੇਹਫਿਲ ਵਿਚ 
ਮੈਂ ਹੀ ਹਾਂ ਤੇਰੀ ਧੜਕਨ ਵਿਚ 
ਮੈਂ ਹੀ ਹਾਂ ਤੇਰੇ ਸਾਹ੍ਹਾਂ ਵਿਚ