Wednesday, 10 September 2014

मौन (लघु कथा)

मौन (लघु कथा)

एक वक़्त  ऐसा था जब हम दोनों भावना का रूप ले चुके थे, यहाँ कुछ शेष नहीं था केवल हम दोनों बरकरार थे, बंधनों को तोड़ने के  लिए, सीमाएं लाँघने के लिए हमने मोहब्बत की
एक दूसरे को देखते, सुनते, बोलते, कहते ना जाने कितना ही समय मानो एक अरसा सा बीत गया, सहसा अब हम थे यह वाक्य निकलते ही मैं गंभीर हो जाता हूँ, समीक्षा करने का साहस नहीं है मुझमें। जब जब मैं नजदीक आया तब तब दूरी गहराती गई मानों दोनों समानंतर हों,
इतने ज़ज्बात  उमड़ने के पश्चात एक दिन सन्नाटा सा छा गया, ना कुछ कहा गया, ना कुछ सुना गया, सबकुछ गतिशील होने के बाद भी वहाँ सब थम सा गया था, अचल, अनिश्चित सा, एक अंधेरा से लिपटी  हुई कुछ संवेदनाए वहाँ मयस्सर थी। शायद हम सब कुछ कह गए थे या फिर गहराई में उतरने की कमी थी तो ही तो वहाँ मौन व्याप्त था।
               
                                                   प्रियोदत्त शर्मा















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