यही मयस्सर है यहां (कविता)
त्रिशुल उठाओ
उतार दो मेरी छाती में
बाणों की सेज बिछाओं
सुला दो उसपर मुझे
करपान निकालो रेत दो मेरा गला
जिस चाकु से तुम मंत्र फूंकते हो
आज वो मेरे बदन को गोदने के काम आएगा
हां मेरी कोई जाति नहीं
यहूदियों की गोली मुझे झेलने दो
वो पीतल मेरे यकृत को चीरना चाहिए
इतनी गति होनी चाहिए उस पीतल में
वो मेरे विचारों की गति थाम सके
मेरा कोई नाम नहीं
मैं ना प्रवासी हूँ
न निवासी
इतना करने के बाद विस्मय
न रखना
अपने जिहाद के प्रति
अपने धर्म
अपने कलमे
बाईबली कहानियों पर कभी
संशय का बिंदू न स्थापित होने देना
मेरे भाव को ना समझ
तुम रखना एक विरक्त भाव
जो केवल रक्त से सना हो
कुरबानी व्यर्थ नहीं जाएगी
तेरे बाणों की
तोप के गोले की
ऐके 47 से निकलती गोलियों की
ए गोलियों की आवाज समोहित करती
रूस को
अमेरिका को
कुछ चरमपंथियों को
भाता वो माहौल
जब बिलबिलाते हुए लोग मरते
बच्चे माओं की लाशों के सामने रोते
जब वो बूढा बाप अपने जवान बच्चे के कटे अंग देखता
कुछ तो केवल घड़िया देखते
हाथ की अंगुठी देखकर
टूट जाते
पर तुम्हे क्या
कई मर्तबा देखा है तुम्हे बर्बरता की हद पार करते हुए
तुम उनको बेनाम मानते हो
अपना हक मांगते हो
हम देते है तुम्हे इसानी
गोश्त
लहू से सना
बारुद सा महकता
पैटाशियम के खंजर में
अटका वो टुकडा
जानवरों के लिए यही मयस्सर है यहां
प्रियोदत्त शर्मा
त्रिशुल उठाओ
उतार दो मेरी छाती में
बाणों की सेज बिछाओं
सुला दो उसपर मुझे
करपान निकालो रेत दो मेरा गला
जिस चाकु से तुम मंत्र फूंकते हो
आज वो मेरे बदन को गोदने के काम आएगा
हां मेरी कोई जाति नहीं
यहूदियों की गोली मुझे झेलने दो
वो पीतल मेरे यकृत को चीरना चाहिए
इतनी गति होनी चाहिए उस पीतल में
वो मेरे विचारों की गति थाम सके
मेरा कोई नाम नहीं
मैं ना प्रवासी हूँ
न निवासी
इतना करने के बाद विस्मय
न रखना
अपने जिहाद के प्रति
अपने धर्म
अपने कलमे
बाईबली कहानियों पर कभी
संशय का बिंदू न स्थापित होने देना
मेरे भाव को ना समझ
तुम रखना एक विरक्त भाव
जो केवल रक्त से सना हो
कुरबानी व्यर्थ नहीं जाएगी
तेरे बाणों की
तोप के गोले की
ऐके 47 से निकलती गोलियों की
ए गोलियों की आवाज समोहित करती
रूस को
अमेरिका को
कुछ चरमपंथियों को
भाता वो माहौल
जब बिलबिलाते हुए लोग मरते
बच्चे माओं की लाशों के सामने रोते
जब वो बूढा बाप अपने जवान बच्चे के कटे अंग देखता
कुछ तो केवल घड़िया देखते
हाथ की अंगुठी देखकर
टूट जाते
पर तुम्हे क्या
कई मर्तबा देखा है तुम्हे बर्बरता की हद पार करते हुए
तुम उनको बेनाम मानते हो
अपना हक मांगते हो
हम देते है तुम्हे इसानी
गोश्त
लहू से सना
बारुद सा महकता
पैटाशियम के खंजर में
अटका वो टुकडा
जानवरों के लिए यही मयस्सर है यहां
प्रियोदत्त शर्मा
No comments:
Post a Comment