Thursday, 31 July 2014

लकीरे

नया-नया घर अभी  लिया है हम जैसे  प्रवासियों के लिए किराए का मकान भी  लेना ही कहलाता है, सीढीयां इतनी सकरी मानो पुरानी दिल्ली की गलियां, ऊपर दरवाजा खोलते ही गंदगी ने हमारा स्वागत किया , कुछ अखबार जो रेत की एक परत से ढक चुके थे, कूड़ा जो हमसे पूर्व रहने वाले किराएदारों द्वारा ऐसे छोड़ा गया था जैसे कोई पूर्वज अपने वंशकों के लिए एक विरासत। मैं और मेरा दोस्त एक दूसरे का चेहरा ऐसे देख रहे जैसे पहली बार हमने एक दूसरे  चेहरे के दर्शन किये हों। कुछ खाली बोतले थी जो इधर उधर बिखरी पडी थी। हम सफाई के लिए झाडू, वाईपर, बाल्टी वो भी  पानी के साथ व एक सुखे कपडे से लैस थे। सफाई की शुरूआत हमने उत्साह से की मैं कूडा उठाने लगा वो झाडू से मिट्टी समेटने के काम में लग गया, कूड़े में एक टूटी पेंसिल मेरे हाथ लगी, दो मैली रबडे जो अक्सर कुछ मिटाने के काम आती, बिस्कुट जो मानो ऐसे लगा रहें हो जैसे जल्दी जल्दी में कोई बीच में  छोड़कर चला गया हो। बच्चे की कलाकारी दीवारों पर अंकित थी। अंतहीन लकीरें, जिनका न कोई अर्थ, बिना किसी रुपरेखा के लेकिन फिर भी  जीवित हम उसे मिटा नहीं पाए।
                   
                                                            (प्रियोदत्त शर्मा) दोस्त रामकिशोर के साथ रोहतक(हरियाणा)

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