Wednesday, 27 August 2014

जड़ पेड़(कविता)

जड़ पेड़(कविता)

मुझे पेड़ों से डर लगने लगा है
न जाने कब से मैं भयभीत  हूँ
यह अब छांव नहीं देते
यहाँ फलों का भी  अस्तित्व नहीं रहा
लाशे देखी हैं जब से मैंने इसकी मोटी शाखाओं से लटकती
तब से मैं मौन हूँ भावहीन जैसे जड़
स्थिरता छाई है,
अब ये  पानी नहीं रक्त पीते
सिंचे जाते है ये इससे
हटा दो इन्हें इस जहां
ये  अब आकबत बन चुके हैं बच्चियों के लिए
यहाँ तपस्या की थी कभी  ऋषियों ने
यहाँ देव निवास करते थे
ये  बरबरता कहाँ से पलने लगी?
खेतों में वस्त्र फाडे गए थे
लाज दाव पर थी
बिलबिला रही थी वो उस दिन भी 
शायद कृ ष्ण याद आता होगा
लेकिन वो न आया
उसका कुल भी  वनिस्पतियों के कारण नाश हुआ था
वो एक तरह की घास थी
खेतों की  उस घास की भांति
शांत, परंतु हतप्रभ  व मूक भी
शैतानों के चेहरे पर भी भाव  न थे
वहाँ केवल लालसा, हवस का साया था
वो पेडो पर लाशें देखने के आदी थे
नौचने वाले शैतान
जहाँ जिस पेड़ो पर सात्विकता वास करती थी कभी
अब वहाँ गर्देने लटती देख मैं शांत हो जाती हूँ
पेड़ की तरह, कृष्ण की तरह

                          प्रियोदत्त शर्मा


No comments:

Post a Comment