Wednesday, 4 June 2014

बस एक आस(कविता)

तू मेरी तकदीर में नही
शायद ये गुस्ताखी होगी कायनात की
वो पहचान ना पाई
एक अबियत है तू
मैं एक शायर हूँ
तू किरण है
मैं वो धरती 
जिसपर तेरा अस्तित्व स्पष्ट होता है
तेरे ताप के निशान में झेलता हूँ
ये अनुभूति करवाते है
तेरे होने की
मैं घास हूँ
तू वो नम है
सोंधा सोंधा घूँघट है तेरा
हमारा एक होना जरूरी है
वैसे ही जैसे शिव और गंगा एक है
तेरे रंग में मैं बनारस हो जाता हूँै
कुछ तजुर्बे हमे अलग करते
लेकिन तेरे वो निशान
मुझे झूने का एहसास करवाते
और मैं फिर डूब जाता
उस आंनंद में
एक अलग दुनिया में
खो जाता मैं कहीं
ये खोना ही पाना है तुझेै
अलग होना विभीषीका है इस संसार के लिए
उस गगन के लिए जो हमारी बदोलत है
एक अफवाह रचता है वो
वो भी तेरा आशिक ै
लेकिन मैं आशिक नहीं
तेरा साया हूँ
जिस्म हूँ
रूह हूँ तेरी
एक त्रासहै उसके मन में
पर मैं बस एक आस पर जिन्दा रहता हूँ

(बनारासिया) 

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