आलिंगन (कविता)
ना जाने कितनी ही पक्तियाँ अधूरी थी
कितनी ही दफ़ा नाराजगी जताई होगी
एक असमर्थता,
परंतु मैं उन्मुक्त भाव से तेरे आलिंगन को तैयार हूँ
फिर टूटे रिश्ते की आवाज आई
एक पुकार
चींखें सुनाई देने लगी
जो चीरती
ये वक़्त है
एक मरहम
पहले इतना पास आए तुम
संभावना भी न होती थी
सांसों में एक निकहत बसी
शायद तुम ही हो
सहसा दूर होती
मैं मर जाता
तुम मेरी बांहों में चेतन से अवचेतन होती
मैं तुम्हें कविता के भँति पाने की तमन्ना करता हूँ
जो न कभी खत्म हो, न ही संपूर्ण
केवल अधूरे ही हम पूरे हो जाते
प्रियोदत्त शर्मा
ना जाने कितनी ही पक्तियाँ अधूरी थी
कितनी ही दफ़ा नाराजगी जताई होगी
एक असमर्थता,
परंतु मैं उन्मुक्त भाव से तेरे आलिंगन को तैयार हूँ
फिर टूटे रिश्ते की आवाज आई
एक पुकार
चींखें सुनाई देने लगी
जो चीरती
ये वक़्त है
एक मरहम
पहले इतना पास आए तुम
संभावना भी न होती थी
सांसों में एक निकहत बसी
शायद तुम ही हो
सहसा दूर होती
मैं मर जाता
तुम मेरी बांहों में चेतन से अवचेतन होती
मैं तुम्हें कविता के भँति पाने की तमन्ना करता हूँ
जो न कभी खत्म हो, न ही संपूर्ण
केवल अधूरे ही हम पूरे हो जाते
प्रियोदत्त शर्मा
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