आग से खाक होता (कविता)
परवान न चढे वो इश्क ही नहीं
धूल न उढ़े वो आंधी कतई नहीं
चलता चलता अगर कोई लम्हा रुक जाए
तो समझों यह एक साजिश होगी
उस पल की
जिसको तुने ठुकरा दिया
जलन तो होनी ही है अब ,तेरे पैरों में
यही रास्ता था वो जिसपर तू दौडा नहीं
एक अश्फाक के लिए भटकता
पथ से भी बिछड़ गया तू
लेकिन वक्त अब चाहता हैं
कि तू मुतरिब की तरह साज को गाए
निकहत की तरह फिजा में घुल जाए
वक्त चाहता है
तू दौडे
एक जलन के साथ
ज्वलनशील बन जाए
राख हो जाए काटें तेरे ताप से
खुद ही की आग में तू भी जलकर खाक हो जाए
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