मै आज भी जल रही हूँ (कविता)
तेरे द्वार आने पर मुझे क्या मिला
तेरी पत्थर आँखे भी मेरे शौहर के ही भांति है
हालांकि मेरा जिस्म भी अब पत्थर हो चुका है
तू भी एज़ाज में मुझे आंसू देता
तेरी प्रार्थना करने के बाद
अब मुजाहमत सी होने लगी है जीने में
इस समाज के रीति रिवाजों की तरह
तू भी एक रु ढ़िवादी विश्वास है
सारी उम्र में तुझसे मांगती रही
एक साथ
लेकिन दिया तूने मुझे
अपनी ही तरह संवेदनशील
बचपन से मैं तेरी पुजारी थी
नारी हूँ ना दामन बस थामती हूँ
और थमाती हूँ
पारर्दशीता नजर आती थी मुझे
तेरी तासिर में
तेरे दीद ही मुझे
आस्तिक बनाते थे
परंतु तू भी वैसा ही निकला
तेरे दर पर मैं आज से नहीं
सदियों से मरती आ रहीं हूँ
मछली सी तड़प है
जो मुझे पल पल मारती है
बस मुझे सुकून दे
मालूम है कि तू अस्तित्वहीन , भ्रम है
मुझे विस्मय न होगा
क्योंकि तू भी तो पुरुष है
तेरी फितरत भी वैसी ही होगी
शायद तू भी भूखा है
प्रार्थना का, सेवा का
जानकी को तूने मिटा दिया
वो जानकी जो तिनके के सहारे
रावण से बचती है
जिसके शौर्य के आगे आग भी दम भरने लगी
तेरे शक से वो विचलत हो उठी
ठीक मछली की तरह
तेरी मर्यादा फिर भी बची रही
फिर मेरी क्या बिसात
बस मैं एक नारी ही तो हूँ
अहिल्या के भांति
मै भी पत्थर हो गई
उसी जानकी की तर्ज पर
मै आज भी जल रही हूँ
और तेरी मर्यादा अभी भी बरकरार हैं
प्रियोदत्त
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