Wednesday, 11 June 2014

ख़ालिस कौन (कविता)

  ख़ालिस कौन   (कविता)
मैं तेरे दीद को तरसता रहा
ठीक एक चकोर  की तरह
तुने दीवाना बनाया था मुझे
अपनी उस आह का, स्वरुप का
छल तो कतई नहीं हो सकता
तुम केवल मुझे परवान पर पाना चाहते थे
क्या है तेरी पराकाष्ठा इससे वाकिफ़ था मैं
तेरी तस्लीम(अभिनंदन) में थी मेरी आँखे, मेरे लरजते(हिलते) होंठ
मेरा इकबाल(सोभाग्य )था तेरा रुतबा, तेरा अस्तित्व
तेरे अश्फाक(सहारे) के लिए मेरे पास बस एक रात है
जज्बातों को जानने के बाद हमने देह को जाना
कुछ जज्बात तो नष्ट हो गये उस मिलन में
कुछेक के लिए जगह ही नहीं बची
बस एक प्रश्न था कि
ख़ालिस (पवित्र ) कौन?
                                       ( प्रियोदत्त शर्मा)



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