इश्क शिव का भी रुसवाई से (कविता)
अच्छा लगता है अब त्याग
ठीक दूर बसती महबूबा के लरज़ते होंठों की तरह
अब आँखे पढने लगी है
किसी किताब को
एक खामोशी का अवलोकन कर रहीे है
शायद अब यही बाकि था
पहले नाकार कर ,
उस एहसास का मज़ाक बनाकर
गलती तो हां तूने की हैं मेरी जान
लेकिन तूझे इससे ही तो जीना आया
दूरी को भी पीकर तू
जी रहा है दिल सीकर तू
मेरे अंजुमन से जुदा होकर
शायद अब खुद के लिए ही होगा तू
लोग तो निग्रा(केवल देखने वाले) है ही
उनकी आखों को देख मत
तेरा आइना तेरी छांया है
जो लुका चुप्पी खेलती है
तेरी तकदीर ,तेरा जिस्म
छांया से दूर होते ही तू मेरी बांहों में टूट जाते है
बिखर मैं भी जाता हूं तेरी दूरी से
एक सीमआब(पारा धातु) की तरह
रक्स करता हूँ तेरे वियोग में
ठीक शिव की भांति
शिव की अंधंगिनी की तरह
तू मेरी है पर
वियोग मेरा नहीं
वो अगालते मेरी नहीं
वो शरीर मेरा है
पर ख्वाहिशें मेरी नहीं
ठीक उस शिव की तरह
जिसकी जटाओं में बसी गंगा
उसकी नहीं
जिसके सिर पर सजा चांद
उसका नहीं
तांडव तो लोगों की देन हैं
वो तो तडपता हैं
उसी वियोग में
केवल उसको शिवानगी ही शांत कर सकती हैं
वो उसका अंग है
उसके दीद के लिए वो तडपती नहीं
वो समाहित है उस
तीसरी आँख में
वो बसती हैं
उसकी देह की भस्म में
परंतु शिव फिर मचलता हैं
धरती कापंती हैं
वियोग है, इश्क है उसे, मुझे
ठीक तेरी और शिवानगी की रुसवाई की तरह
प्रियोदत्त शर्मा
No comments:
Post a Comment