Sunday, 28 September 2014

बहुत ही दिनों से हम प्रयास की वश में हैं जहां काम की ललक है, खाने का होश नहीं, बस कंप्यूटर की स्क्रीन लगातार डेस्क पर आते जाते पेज और आफिस के खाते की चाय का स्वाद हमें बोर करने लगा है, कमरे में फैली धूल, किताबें वहीं थमी है उन पर एक अदृश्य सी धूल की चादर मंडरा रही है जो द्रिखती नही ठीक वैसे ही जैसे कई घंटे काम करने के बाद भी पत्रकारों की थकान नजर नहीं आती बस वो बिस्तर पर महसूस की जाती है,

आह  बहुत दुख रहा है शरीर ..

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