Wednesday, 18 June 2014

लाल रंग (कविता)

  लाल रंग (कविता)

क्या काफी है केवल टोपी मुस्लमान की पहचान के लिए
क्या हाथ पर छपा ओम का चिंह ये दर्शता है कि तुम हिंदू हो
सिख की पग़ड़ी ही उसकी  मौत का कारण बनी थी
उस दौर में जब
बडा पेड़ गिरा था
कई पौधों की जडें लुप्त हो गई थी
लेकिन उससे  भी पहले
सदिया लहु पी चुकी  है
पानी नहीं
 वही लाल लहु
  जिसे देखते आज तेरा मेरा जिगरा विचलित हो उठता है
देख आज भी  शिया और सुन्नी हथियार के साथ है
बाबरी के नाम पर हिंदू भी  तैयार रहता है
रक्त बहाने को
शामली में बैठे वो लोग
जो बरसों से विस्थापन झेल झेल कर बंजारे हो गए है
क्यों कभी  सिख तो कभी  मुस्लमान कभी हिंदू तो कभी  कोइ काला गोरा
अपने अदम(अस्तित्व) को साबित करने के लिए खुंखार बनता है
जानते नहीं है वो चरमपंथी की लाल हमेशा
लाल ही होता है
चाहे लहु हो या किसी मां का बच्चा
आज वही हो रहा है खाड़ी देशों में
जो पहले कभी  हमारे तुम्हारे मुल्कों में हुआ था
वही लोग बाग सदैव ना जाने क्यों
मानव की पहचान के लिए धर्म की आड़ लेते है
कहां है उनकी संवेदना , कहां गया वो इश्फाक(दया भाव )
जिसकी कहानियां कुरान में
जिसके अध्याय गीता में
व जिसकी चौपाई गुरुग्रंंथ साहिब में लिखित है
बाईबल भी  तो सौहार्द का ही संदेश देता है
इतनी अवमानना करने के बाद
क्यों कर रहे हो बर्बरता की पालना
 हम पहले है हमारा धर्म बाद में
यह कोई समझाओं उनको
याद रखना की लहु बहाने वाले का जिगरा होता है
न की काटने वाले का
कमजोर विचलित होकर गाहे बगाहे हाथ मारता है
 तूम काटते जाउ
हम कटते जाएंगे
हंसी ही होगी हमारे चेहरों में
उस अंत समय में भी  हम भीख नहीं मांगेगें
अपनी बच्ची की जान की
जानते हो वो बच्ची भी  तुम्से नहीं डरती
तुम्हारी बंदूकों से
उस बदहवासी आवाज से
रुआंसे तुम लग रहे हो
शायद तुम्हारा मन नहीं भर रहा हमारी लाशों से
तो वो देखों लोगों का जखीरा आ रहा है
कटने के लिए
उठाओं अपने हथियार और देख लो हमारे लहु के रंग को
शायद अब हमारा लहू का  रंग शहीदी के रंग में रंगा हो
और तुम्हारे चेहरे पर खुशी लौट आए
                                                                                        प्रियोदत्त शर्मा

No comments:

Post a Comment