Tuesday, 3 June 2014

झल्ला जाता हूँ (कविता)

 
रात की बारिश , साथ देता तूफान
न जाने क्यों  , अंधेरे को और घना कर देती है
एक गहराई का आगमन होता हैं
परछाई के साथ उल्लु रक्स (नाच) करते हैं
इस रात पर कविता लिखता मैं
झल्ला जाता हूँ,

आँख जब उन तारों की
आफताब से जो जा मिलती हैं
काली घटाओं के साथ, सुनसान रास्तों पर
एक खामोशी जब पसरती हैं
तो उसमें वीभत्सा नहीं
केवल मार्मिकता को देख मैं
डूब जाता हूँ,
वीरान उस पथ पर भी , बिना किसी साथ के
अकेले ही निकल जाता है राही
क्योंकि वहाँ बस रात बोलती है
राही चलता हैं,,, बस चलता  हैं
और मैं फिर झल्ला जाता हूँ.. डूब जाता हूँ
                                                     
                                                                   d´fi¹fûQØf Vf¸ffÊ


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