युद्ध व्यवसाय है (कविता)
28 जुलाई आ गई
सौ वर्ष पूर्व
कोई मैदान न था
बस लोग तैनात थे
एक बाग में खड़े पेड़ की तरह जड़
वो एक झुंड, जो मानो इशारे का इंतजार में हो
कुछ दूरबीने निगाह बनी थी
बंकर हथगोलों से भरे थे, ठीक उस झलकते पैमाने की तरह जो कभी बिखर जाता तो कभी थोडा खाली सा देखता
बाल्कन प्रायद्वीप पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए
शुरू हुआ था सब
तुर्की ने स्वयं घोषणा की
शक्तियों में टक्कर हुई
बिस्मार्क नेपोलियन द्वारा किए शोषण का बदला लेना चाहता था
खुन पीना चाहता था वो
कारणवश उसे खुनी शैतान की उपाधि मिली
विडो विल्सन खारिज करने के लिए ही शांति प्रस्ताव लाया
लोग भिड़े , कोने कोने के ,जो अपने प्रतिद्व्ंधि की राष्ट्रीयता तक नहीं जानते थे
अस्सी लाख मरे इस त्रासदी में
कईयों के अंग कटे
कई दिमागी लाचार हुए
सुना है वो सोए नहीं सदियों तक
भटकते रहे , झांकते रहे , बस वो सोए नहीं
एक कर्बिस्तान से रो रहे हैं आज भी
महबृूबा का खत, मां के आंचल की पग उस सरदार के सिर थी
यहुदी ने अंगुली में अंगुठी के बीच कुछ यादेंं छुपा रखी थी
सब कुछ छुटता गया
ये विश्व युद्ध था
न ही कोई बुुद्धिजीवी इसे प्रथम, न ही द्वितीय की फेहरिस्त में रख सकते हैं
ये सौ साल पूर्व थमा ना था , उतरार्द्ध में उफन जाता
चल रहा है गाजा में, युक्रेन में, इराक की गलियों में भी
हर मौहल्ले में ये चल रहा है
प्रस्ताव आज भी आ रहें हैं
बस केवल खारिज होने के लिए
युद्ध निरंतर प्रक्रिया बन चुका है
एक व्यवसाय बन चुका है
जहां बसते घर उजाडे जाते
जहां किलकारियां चीखों में बदलने का काम करती
संवेदना स्वयं नाश हो जाती इस व्यवसाय में
बचता तो केवल एक हथियार
जो फिर कभी व्यवसाय के काम आएगा
जो फिर कभी काम आएगा
प्रियोदत्त शर्मा
28 जुलाई आ गई
सौ वर्ष पूर्व
कोई मैदान न था
बस लोग तैनात थे
एक बाग में खड़े पेड़ की तरह जड़
वो एक झुंड, जो मानो इशारे का इंतजार में हो
कुछ दूरबीने निगाह बनी थी
बंकर हथगोलों से भरे थे, ठीक उस झलकते पैमाने की तरह जो कभी बिखर जाता तो कभी थोडा खाली सा देखता
बाल्कन प्रायद्वीप पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए
शुरू हुआ था सब
तुर्की ने स्वयं घोषणा की
शक्तियों में टक्कर हुई
बिस्मार्क नेपोलियन द्वारा किए शोषण का बदला लेना चाहता था
खुन पीना चाहता था वो
कारणवश उसे खुनी शैतान की उपाधि मिली
विडो विल्सन खारिज करने के लिए ही शांति प्रस्ताव लाया
लोग भिड़े , कोने कोने के ,जो अपने प्रतिद्व्ंधि की राष्ट्रीयता तक नहीं जानते थे
अस्सी लाख मरे इस त्रासदी में
कईयों के अंग कटे
कई दिमागी लाचार हुए
सुना है वो सोए नहीं सदियों तक
भटकते रहे , झांकते रहे , बस वो सोए नहीं
एक कर्बिस्तान से रो रहे हैं आज भी
महबृूबा का खत, मां के आंचल की पग उस सरदार के सिर थी
यहुदी ने अंगुली में अंगुठी के बीच कुछ यादेंं छुपा रखी थी
सब कुछ छुटता गया
ये विश्व युद्ध था
न ही कोई बुुद्धिजीवी इसे प्रथम, न ही द्वितीय की फेहरिस्त में रख सकते हैं
ये सौ साल पूर्व थमा ना था , उतरार्द्ध में उफन जाता
चल रहा है गाजा में, युक्रेन में, इराक की गलियों में भी
हर मौहल्ले में ये चल रहा है
प्रस्ताव आज भी आ रहें हैं
बस केवल खारिज होने के लिए
युद्ध निरंतर प्रक्रिया बन चुका है
एक व्यवसाय बन चुका है
जहां बसते घर उजाडे जाते
जहां किलकारियां चीखों में बदलने का काम करती
संवेदना स्वयं नाश हो जाती इस व्यवसाय में
बचता तो केवल एक हथियार
जो फिर कभी व्यवसाय के काम आएगा
जो फिर कभी काम आएगा
प्रियोदत्त शर्मा
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