सांप्रदायिकता का गुबार (कविता )
ना जाने कितनी चींखे उठी होंगी
वियतनाम में
हिरोशिमा में
नाकासाकी में
गगन उस दिन धुएं के रंग में रंगा था
रक्त से धरती का आंचल सना था
आसमान के असली रंग की तरह
उस रोज होंठ नीले थे लोगों के
मछली की तरह तड़प रहे थे सब
जल नहीं मयस्सर था वहां
सबकुछ इतनी जल्दी हुआ
समझ ना सका वो देश
वो धरती श्मशान बन गई
वहां जला नहीं कोइ
बस तड़पते रहे
सोचता हूं अक्सर
कि क्यों इतनी चींखे
नहीं कर पाई होगीं मुकाबला
उस गुबार का
जो हवा में शैतान की तरह तैनात था
चीर नहीं पाई वो चींखे
फटते जिगरे की भी आवाज
शुन्य साबित हुई
परमाणु अकेला नहीं होगा
वहां कुछ शैतानिया होंगी
वहां कुछ नीतियां होंगी
सांसों में जाकर उफान पैदा करता
मैने ऐसी बातें वियतनाम की उस बच्ची से सुनी हैं
जापान के लोग आज भी परमाणु और उफनती अधड़
सांसों के बीच जीते हैं
चिली में ग्रासिया ने बर्बरता का इतिहास लिखा
पाब्लो की किताबें आज भी वैसे ही चीखती हैं
मेरे कानों में
वो जिंदा हैं
कई बार अफगान से होती हुई
पाकिस्तान को मारती
भारत भी आई
परमाणु नहीं यहां मौजूद था
यहां तो हर हर महादेव
बिस्मिल्लाह अल रहमान
जो बोले सो निहाल
जैसे नारों ने मिलकर
यह काम किया
जो कभी रसायनों के तर्ज पर होता था
आज धर्म के बिनाह पर टिका
कालांतर से अब तक तरिके बदले
लड़ने के, लड़ाने के
लेकिन लाशें वहीं थी
रक्त उसी तरह लाल था
नीतियां भी वैसी ही थी
मरने वाले भी वही
औरतों के कटे वक्ष
बच्चों के अलग धड़
यही देखे
सांप्रदायिक्ता का जलता टायर
उस सिख के गले में था
इसकी जड़ में कुछ पंडित
कुछ ईमान जकड़े थे
जो आज भी गुबार उठाने के लिए तैयार हैं
बस एक बार बोलो हर हर महादेव
बिस्मिल्लाह
प्रियोदत्त शर्मा
ना जाने कितनी चींखे उठी होंगी
वियतनाम में
हिरोशिमा में
नाकासाकी में
गगन उस दिन धुएं के रंग में रंगा था
रक्त से धरती का आंचल सना था
आसमान के असली रंग की तरह
उस रोज होंठ नीले थे लोगों के
मछली की तरह तड़प रहे थे सब
जल नहीं मयस्सर था वहां
सबकुछ इतनी जल्दी हुआ
समझ ना सका वो देश
वो धरती श्मशान बन गई
वहां जला नहीं कोइ
बस तड़पते रहे
सोचता हूं अक्सर
कि क्यों इतनी चींखे
नहीं कर पाई होगीं मुकाबला
उस गुबार का
जो हवा में शैतान की तरह तैनात था
चीर नहीं पाई वो चींखे
फटते जिगरे की भी आवाज
शुन्य साबित हुई
परमाणु अकेला नहीं होगा
वहां कुछ शैतानिया होंगी
वहां कुछ नीतियां होंगी
सांसों में जाकर उफान पैदा करता
मैने ऐसी बातें वियतनाम की उस बच्ची से सुनी हैं
जापान के लोग आज भी परमाणु और उफनती अधड़
सांसों के बीच जीते हैं
चिली में ग्रासिया ने बर्बरता का इतिहास लिखा
पाब्लो की किताबें आज भी वैसे ही चीखती हैं
मेरे कानों में
वो जिंदा हैं
कई बार अफगान से होती हुई
पाकिस्तान को मारती
भारत भी आई
परमाणु नहीं यहां मौजूद था
यहां तो हर हर महादेव
बिस्मिल्लाह अल रहमान
जो बोले सो निहाल
जैसे नारों ने मिलकर
यह काम किया
जो कभी रसायनों के तर्ज पर होता था
आज धर्म के बिनाह पर टिका
कालांतर से अब तक तरिके बदले
लड़ने के, लड़ाने के
लेकिन लाशें वहीं थी
रक्त उसी तरह लाल था
नीतियां भी वैसी ही थी
मरने वाले भी वही
औरतों के कटे वक्ष
बच्चों के अलग धड़
यही देखे
सांप्रदायिक्ता का जलता टायर
उस सिख के गले में था
इसकी जड़ में कुछ पंडित
कुछ ईमान जकड़े थे
जो आज भी गुबार उठाने के लिए तैयार हैं
बस एक बार बोलो हर हर महादेव
बिस्मिल्लाह
प्रियोदत्त शर्मा
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