मुझे अंजान जानते ही साडी के एक छोर में उसने गांठ मार ली थी, जैसे कोई मुल्यवान चीजÞ को वो मुझसे छुपाना चाहती हो। सड़क पर गाड़ियो की आवाजाही उसकी और मेरी बातों में खलल डालने को बेताब थी तेज़ चलते वाहन मानो एक इच्छा को कौंधते हो। हस्तशिल्प का कार्य करते करते हाथ की बुआईयों में कुछ कटाव थे ठीक वैसे ही जैसे सड़क के किनारों पर बारिश की बदौलत कुछ दरारें। मुझे उसकी आँखों में दर्द नहीं दिखा। लेकिन बारिश तो उन आँखों में भी हुई थी।
उस रास्ते से जाते वक्त न जाने क्यों में अचानक थम गया था शायद उस किनारे पर पडी हस्तकला की वस्तुओं ने मुझे रोक लिया, यह हुनर ही था कि मैं उसके पास जाकर कुछ जानने को इच्छुक हुआ। मेरी जिज्ञासा ने मेरी गति को एक ठहराव दिया और तपती गर्मी में भी मेै उसके पास ठीक उसी तरह बैठ गया जिसप्रकार वो जमीन की छाती पर बहुत ही सुकून के साथ बैठी थी, उन दफ्तरी कुर्सीओं में वो अहसास कहाँ (यह प्रश्न मेरा था), उसके बिल्कुल सामने बैठे हुए, मुझे उसके चेहरे पर आँसु की एक सुखी लकीर दिखी जो उसके रोने का बयान कर रहीं थी।
बैठते ही मैंने उससे पूछा कि आप यह लकड़ी की कुर्सी, सोफे क्या स्वयं बनाते है? मेरे सवाल को उसने बहुत सहज लिया।
-नहीं यह हम असम से लाते हैं।
-कितने समय के पश्चात आप असम जाते है?
-हम नहीं जाते सामान ट्रक से आता है, कई-कई बार हमारा सामान भी पकडा जाता हैं
उसकी आवाज में भारीपन आ गया मानो किसी ने पत्थर रख दिया हो
-आपको यहाँ इस सड़क के किनारे रात में हमारे सिपाही तंग नहीं करते?
-नहीं, कभी नहीं
-चोरी वोरी हुई कभी
-अभी तक तो नहीं हुई
देश की कानून व्यवस्था और चोरों के नैतिक मूल्यों पर मुझे गर्व हुआ। वैसे भी लेखक इनके काम पर लगातार नजर रखे हुए है फिल्मों से लेकर वास्तविकता में पुलिस का देरी से आना और चोरों का मजबूरी में चोरी करना लेखक के मन में दोनों वर्गो के प्रति संवेदना का बीज बौता हैं।
मैंने उनसे उनके पति के बारे में पूछा तो जवाब आया कि सामने दारु पीकर जो पॉर्क की हवा में सपने ले रहा है, वो मेरा पति है। (दारु पीकर मारना, गाली देना इनका धर्म हैं)
आपके बच्चे ?
-वहीं रहते है गांव में, पढते है तीनों
अच्छा ...
सामने उनका पति अब उठ गया था, लेटे लेटे ही अपने धर्म का पालन कर रहा था। मेरे कदम भी सीधे हुए, खडा होकर चल दिया.. बस एक ही बात निकली कि वक्त वक्त की बात है। सड़क पर दौड़ती गाड़ियों ने हमारी बातों में खलल नहीं डाली बल्कि सन्नाटा था वहाँ जो उसके हर बयान से गहराता था।
(प्रियोदत्त शर्मा)
लेखक कदापि नहीं
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