Saturday, 7 June 2014

प्यार की फितरत (कहानी

  प्यार की फितरत (कहानी)

बीते कुछ दिनों से पकंज को नींद नहीं आ रही थी, वैसे तो वो घोड़े बेचकर सोने की आदत से ग्रस्त था पर अब प्रतीत होता कि घोड़े बिक चुके है। उसके घोडे  खरीदने वाली अर्थात उसकी नींद चुराने वाली और कोई नहीं अपितु उसकी दोस्त माही थी।
 पहले तो उसने माही से नींदों में बात की , फिर काली काली रातों में जगी आँखों से गुफ्तगु होती रही, उसी जागी जागी सी नींद में वो माही को पा चुका था लेकिन माही उसे केवल अपना अच्छा दोस्त मानती थी पर पंकज उसे एक अहौदा देता, प्यार देने का ही तो नाम है। अपने साथी चाचा से यही सुना था उसने , दरअसल चाचा उसका दोस्त था जिसका असली नाम कोई कोई ही जानता जब से उसकी मोहब्बत किसी और की हो गई है तब से चाचा रात के अंधेरे को दूर करने के लिए शराब का सहारा लेता। जाति अलग होने के कारण चाचा का प्यार भी  अलग हो गया। पंकज को केवल इतना ही बताता कि मैं उससे मिला था शादी से पहले, ताकि उसके दिल की बात जान सकुं। मैंने उससे पूूछा पंकज कि तू क्या चाहती है? जवाब पता क्या आया ईज्जत तेरी भी  और माँ बाबा की भी , बस इतना बोलते ही चाचा चुप मानो आज  भी ईज्जत की परवाह पड़ी हो, चाचा की खामोशी ही बयान करती कि प्यार त्याग का ही तो नाम हैं।
धीरे धीरे पंकज ने कॉलेज में अपने दोस्तों के साथ रहना कम कर दिया और एकांत से नाते जोड़ने लगा। माही के दूर होते ही उसके दीद को तरसता पर जब वो सामने आती तो गर्दन इधर उधर घूमाता, बगीचे में पेड़ों के पीछे से निहारने का काम वो बखूबी करता। माही को देखते ही वो पेड़ के साथ पेड़ बन जाता। न जाने क्या हुआ था उसे पिछले एक वर्ष से कोई मतलब नहीं था उसे माही से... फिर ये अचानक  ऐसे सवाल उसे दुखी नहीे करते वो नकारता इन सवालों तलाश तो उसे केवल और केवल माही के प्यार की ही थी।
एक दिन निशा से उसने माही का फोन नंबर लिया रात में हिम्मत कर फोन किया न जाने इतना हौंसला अचानक कहाँ से आ गया उसमें शायद ये उसी माही का कमाल था जो रातों में उससे बातें करती ठीक एक कल्पना की तरह जिसपर वो अपने वजूद से ज्यादा यकीन करने लगा, ये विश्वास उसी ने पैदा किया।
फोन पर अपना नाम बताने के बाद उसने एक घबराऐं हुए अंदाज को एकाएक त्यागते हुए कह दिया कि मुझे तुम्से प्यार हैं, मैं कई रातों से सोया नहीं हूँ तेरी वजह से, दोष मंडता हुआ वो माही को बच्चों की तरह लगने लगा। माही ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बल्कि कहा कि कल हमें मिलना चाहिए।
तपाक से बोला हाँ कल मिलते हैं, इस खुशी में माही की प्रतिक्रिय भी  जाननी भूल  गया। अगले दिन दोनों मिले पंकज खुश था लेकिन माही की आँखों में वो नहीं देख पाया। उसकी भावनाओं का आदर करते हुए माही पंकज को अपने अतीत की और ले गई।
उसने उसे पहले प्यार के बारे में बताया जो उसे धोखा दे गया था,
- पंकज मैं और धोखे बर्दाश्त नहीं कर सक ती, पंकज क्या हम अच्छे दोस्त बनकर नहीं रह सकते वो बोला क्यों नहीं सवाल उसके पास कोई भी  नहीं था, निहता था बिल्कुल, न कोई चालाकी,न कोई फहरेब बस केवल प्यार से लैस आशिक।
- आज से हम दोनों दोस्त माही ने ये कहते हुए हाथ आगे बढ़ाया
- उसने हाथ मिलाते हुए कहा जरुर माही
  धीरे धीरे दोनों की फोन पर खूब बातें होने लगी, समझने लगे वो एक दूसरे को
एक दिन माही ने उसे कहा कि तुम सब कुछ साफ साफ कहो क्या आज भी  तुम ..
- इतना बोलते ही पंकज का प्यारनुमा ज्वालामुखी फट गया लगातार वो बोलता ही जा रहा था कि मैं तुम्हे धोखा नहीं दूंगा माही भावुक हो गई माही भी  अपना दिल हल्का करना चाहती थी।
- वो बोली कि वो मुझसे बहुत प्यार करते हैं
- पंकज जानबूझकर फोन पर हैलो हैलो करने लगा जैसे ये हैलो उस वाक्य को शायद बदल दें।
- माही बिना कुछ सुने वो खुद से भी  ज्यादा चाहते हैं मुझे, मैं उन्से प्यार नहीं करती बल्कि उनके प्यार से प्यार करती हूँ
- पंकज सोच रहा था कि धोेखें खाने के बाद इंसान कितना मजबूत हो जाता हैं।
- माहीं बोली वो मुझसे उम्र में 12 वर्ष बड़े हैं
- यह वाक्य पंकज के कान में तिनके  की तरह चुभे , संपूर्ण ब्रहमांड में यह गुंज रहा था। माही के रोने की आवाज ने पंकज को झिझोड़कर रख दिया वो आँसू दिख नहीं रहे थे लेकिन पंकज कहीं आज उन आसूओं के आब में बह न जाए
- पंकज बोला माही मैं तुम्से कल मिलना चाहता हूँ फिलहाल तुम चुप हो जाओं
अगले दिन मुलाकात हुई फोन पर माही ने जो बात बताई थी उसको लेकर वो सोच रहा था, वो सामने थी
माही ने कहा कि परम एक व्यवसायी हैं
पंकज तो अब प्यार करता था उससे काले रंग के चश्में से उसने अपनी आँखें ढक ली
माही क्या तुम्हारा उन्से शादी का प्लॉन है?
हम पाँच साल से साथ हैं पंकज इसको लेकर बहुत बात हुई लेकिन हम शादी नहीं कर सकते
हमारा समाज के कुछ कायदे है जिनकी दीवार लांघी नहीं जा सकती ,पंकज केवल सुनना चाहता था, एक जिज्ञासा थी उसके अंदर ,
उनकी  शादी हो चुकी है और एक बच्चा भी  हैे, उनकी पत्नी पहली रात को ही उनके दिल से दूर हो गई वो किसी ओर से प्रेम करती थी, उसने उनको बताया तो वो स्तब्ध रह गये, इधर पंकज का भी  यही हाल था।
माँ बाप की ईज्जत के लिए शादी का बंधन उन्होने बांध लिया था लेकिन दो महीने बाद परम ने अपनी पत्नी के प्रेमी से उसका विवाह करवा   दिया, बच्चा उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही  अनाथालय से गोद लिया हैं।
पंकज भूल  चुका कि वो माही को प्यार करता है, बस यह सोच रहा था कि क्या दूसरी बार परम समाज द्वारा निर्मित दीवारोें को पार कर पायेगा,
पंकज इस अधुरे प्यार को ही प्यार की फितरत मान कर माही के आँख से टपकते आंसू  पौंछता रहा।    
                                                                                     (प्रियोदत्त शर्मा)

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