एक बच्चा
रास्ते पर चलता चलता मेैं अक्सर एक अंतहीन सोच में डूब जाता, दफ्तर की ओर जाते मुझे न तपते सूरज की सूध रहती, न ही आसपास घटित होती उन घटनाओं की जो कभी कभी अनायास ही घट जाती। पर उस दिन समाचार सुनने के बाद मैं सीधे दफ्तर को निकला ही था कि रास्ते मैं एक बच्चा खेलता दिखा। जिसकी आंखों में ख्वाहिशें पल रही कि भविष्य सुनहेरा होगा ठीक गोरेया के पंखों की तरह, जो आसमां की ऊंचाइयों को अपने मात्र छोटे छोटे पंखों से लंबी दूरी तय कर लेती।वैसे ही उसके कदम थे, छोटे छोटे
चूंकि मैं समाचार देखते समय यह देख कर आया था कि एक छोटा बच्चा भी उस बम का शिकार हुआ जो इज्राइल ने फिलीस्तान पर गिराए थे। मेरी कल्पना उस ओर सोचने लगी मैं फिलीस्तान में था सामने वो बच्चा और चारों तरफ सिर्फ तबाही तबाही,कुछ खिड़कियां ,टूटी छत । आंखें स्तब्ध हो गई, रक्त ठहर गया और मेरे सामने वो बच्चा उस गोले का शिकार हो गया, मैं देखता रहा फिर दफ्तर पर आकर समाचारों का सिलसिला शुरु हो गया। बच्चे मरते गए हम देखते गए, उनके भविष्य नहीं अपितु हम अपने समय को लेकर चिंतित नजर आ रहें हैं।
छोड़ दो उन्हें
नहीं उनका कोई कसूर
उतारना है तो बारुद
मेरी देह में उतारो
मै उनका हितैषी हूँ
मेरी कलम उनके लिए है
ये कागज उनके लिए है
ये जज्बात उनके लिए है
प्रियोदत्त शर्मा
रास्ते पर चलता चलता मेैं अक्सर एक अंतहीन सोच में डूब जाता, दफ्तर की ओर जाते मुझे न तपते सूरज की सूध रहती, न ही आसपास घटित होती उन घटनाओं की जो कभी कभी अनायास ही घट जाती। पर उस दिन समाचार सुनने के बाद मैं सीधे दफ्तर को निकला ही था कि रास्ते मैं एक बच्चा खेलता दिखा। जिसकी आंखों में ख्वाहिशें पल रही कि भविष्य सुनहेरा होगा ठीक गोरेया के पंखों की तरह, जो आसमां की ऊंचाइयों को अपने मात्र छोटे छोटे पंखों से लंबी दूरी तय कर लेती।वैसे ही उसके कदम थे, छोटे छोटे
चूंकि मैं समाचार देखते समय यह देख कर आया था कि एक छोटा बच्चा भी उस बम का शिकार हुआ जो इज्राइल ने फिलीस्तान पर गिराए थे। मेरी कल्पना उस ओर सोचने लगी मैं फिलीस्तान में था सामने वो बच्चा और चारों तरफ सिर्फ तबाही तबाही,कुछ खिड़कियां ,टूटी छत । आंखें स्तब्ध हो गई, रक्त ठहर गया और मेरे सामने वो बच्चा उस गोले का शिकार हो गया, मैं देखता रहा फिर दफ्तर पर आकर समाचारों का सिलसिला शुरु हो गया। बच्चे मरते गए हम देखते गए, उनके भविष्य नहीं अपितु हम अपने समय को लेकर चिंतित नजर आ रहें हैं।
छोड़ दो उन्हें
नहीं उनका कोई कसूर
उतारना है तो बारुद
मेरी देह में उतारो
मै उनका हितैषी हूँ
मेरी कलम उनके लिए है
ये कागज उनके लिए है
ये जज्बात उनके लिए है
प्रियोदत्त शर्मा
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