अलविदा (कविता)
कई बार प्रतीत होता
मै सीमित हो जाता हूँ
ठीक पुष्प की सौगंध की तरह
पेड की छाया की भांति
तेरे चेहरे का उस एक इंच मुस्कान के जैसे
सब कुछ हुआ एक ललक से
अब वो खत्म हुई तो
नज्म में ही तेरा वजूद है तो
क्यों तलाश कंरु प्रकृ्ति में
न जाने क्यों अब तेरी तस्वीर नहीं भाती
पर शहर का जिक्र आते ही
मै झुंझलाहट से लैस सन्नाटे को महसूस करता
ठीक वैसी ही माहौल जैसा युद्ध के मैदानों में
उसके खत्म होने के पश्चात होता
संमभोग के बाद दो जिस्मों के बीच यही
सन्नाटा पसरता है ना
वियोग जैसे कभी श्मशान में
कभी मेरे अंर्तमन में
बस वो छा जाता
यह सब लगातार के साथ क्षणिक भी
मौसम के बदलाव के अनुसार बदलाव
कभी कभी तो रात बोलती
तो मैं कापने लगता
रात मुझे अपनी बांहों मे ले लेती
ठीक तेरी बातों की तरह
उस आगोष में मैं सो जाता
गुम और गम के साथ
अब रात बोलती नहीं
यदा कदा जिंदगी चलती रही तेरे अभाव में
लेकिन एक दिन आहट हुई
अंदर से
वही अंदर जिसको चिकित्सक नहीं जान पाए
वैज्ञानिक उसी अंदर में डूब गए
जैसे कोई बेजान पत्थर डूबता
प्रकिया जारी है इसी अंदर को खोजने की
ऐसा शोधकर्ताओ का कहना है
उस पल यहां न कोई आवाज थी, न कोई सन्नाटा
बस आहट थी
किसी के कदमों की
ठीक वैसे ही जैसे पेड़ के अंदर से कोई पक्षी चहचाता हो
बस तेरी अनुभूति उसी आहट में सम्माहित होती गई
पानी किसी में मिलता
तो वैसा ही हो जाता
वैसे ही तू आई
विरक्त भाव के साथ आज भी मैं
रास्ते पर था
पर मंजिल स्वयं दर पर
शून्य का तरह मै उसे समझ नहीं पाया
सहसा मेरी सांसे थम गई
निगाहें एकाएक पत्थर हो गई
वही पत्थर जो डूबने के लिए बना है
समय ने तुझे भी खड़ा कर ही दिया
दर पर
तेरी विस्मयकारी आंखों के साथ
मेरी धडकने मिल जाती
क्यों आई तू इस पंक्षी के पास
मै अब नहीं उड सकता
मैं कट चुका हूँ
दिल पर हाथ रखे एक इंच मुस्कान के साथ
बस अलविदा
प्रियोदत्त शर्मा
कई बार प्रतीत होता
मै सीमित हो जाता हूँ
ठीक पुष्प की सौगंध की तरह
पेड की छाया की भांति
तेरे चेहरे का उस एक इंच मुस्कान के जैसे
सब कुछ हुआ एक ललक से
अब वो खत्म हुई तो
नज्म में ही तेरा वजूद है तो
क्यों तलाश कंरु प्रकृ्ति में
न जाने क्यों अब तेरी तस्वीर नहीं भाती
पर शहर का जिक्र आते ही
मै झुंझलाहट से लैस सन्नाटे को महसूस करता
ठीक वैसी ही माहौल जैसा युद्ध के मैदानों में
उसके खत्म होने के पश्चात होता
संमभोग के बाद दो जिस्मों के बीच यही
सन्नाटा पसरता है ना
वियोग जैसे कभी श्मशान में
कभी मेरे अंर्तमन में
बस वो छा जाता
यह सब लगातार के साथ क्षणिक भी
मौसम के बदलाव के अनुसार बदलाव
कभी कभी तो रात बोलती
तो मैं कापने लगता
रात मुझे अपनी बांहों मे ले लेती
ठीक तेरी बातों की तरह
उस आगोष में मैं सो जाता
गुम और गम के साथ
अब रात बोलती नहीं
यदा कदा जिंदगी चलती रही तेरे अभाव में
लेकिन एक दिन आहट हुई
अंदर से
वही अंदर जिसको चिकित्सक नहीं जान पाए
वैज्ञानिक उसी अंदर में डूब गए
जैसे कोई बेजान पत्थर डूबता
प्रकिया जारी है इसी अंदर को खोजने की
ऐसा शोधकर्ताओ का कहना है
उस पल यहां न कोई आवाज थी, न कोई सन्नाटा
बस आहट थी
किसी के कदमों की
ठीक वैसे ही जैसे पेड़ के अंदर से कोई पक्षी चहचाता हो
बस तेरी अनुभूति उसी आहट में सम्माहित होती गई
पानी किसी में मिलता
तो वैसा ही हो जाता
वैसे ही तू आई
विरक्त भाव के साथ आज भी मैं
रास्ते पर था
पर मंजिल स्वयं दर पर
शून्य का तरह मै उसे समझ नहीं पाया
सहसा मेरी सांसे थम गई
निगाहें एकाएक पत्थर हो गई
वही पत्थर जो डूबने के लिए बना है
समय ने तुझे भी खड़ा कर ही दिया
दर पर
तेरी विस्मयकारी आंखों के साथ
मेरी धडकने मिल जाती
क्यों आई तू इस पंक्षी के पास
मै अब नहीं उड सकता
मैं कट चुका हूँ
दिल पर हाथ रखे एक इंच मुस्कान के साथ
बस अलविदा
प्रियोदत्त शर्मा