Friday, 27 June 2014

अलविदा (कविता)

  अलविदा (कविता)

कई बार प्रतीत होता
मै सीमित हो जाता हूँ
ठीक पुष्प की सौगंध की तरह
पेड की छाया की भांति
तेरे चेहरे का उस एक इंच मुस्कान के जैसे
सब कुछ हुआ एक ललक से
अब वो खत्म हुई तो
नज्म में ही तेरा वजूद है तो
क्यों तलाश कंरु प्रकृ्ति में

न जाने क्यों अब तेरी तस्वीर नहीं भाती
पर शहर का जिक्र आते ही
मै झुंझलाहट से लैस सन्नाटे को महसूस करता
ठीक वैसी ही माहौल जैसा युद्ध के मैदानों में
उसके खत्म होने के पश्चात होता
संमभोग के बाद दो जिस्मों के  बीच यही
सन्नाटा पसरता है ना
वियोग जैसे कभी  श्मशान में
कभी  मेरे अंर्तमन में
बस वो छा जाता
यह सब लगातार के साथ क्षणिक भी 
मौसम के बदलाव के अनुसार बदलाव
कभी  कभी तो  रात बोलती
तो मैं कापने लगता
रात मुझे अपनी बांहों मे ले लेती
ठीक तेरी बातों की तरह
उस आगोष में  मैं सो जाता
गुम और गम के साथ
अब रात बोलती नहीं
यदा कदा जिंदगी चलती रही तेरे अभाव में
लेकिन एक दिन आहट हुई
अंदर से
वही अंदर जिसको चिकित्सक नहीं जान पाए
वैज्ञानिक उसी अंदर में डूब गए
जैसे कोई बेजान पत्थर डूबता
प्रकिया जारी है इसी अंदर को खोजने की
ऐसा शोधकर्ताओ का कहना है
उस पल यहां न कोई आवाज थी, न कोई सन्नाटा
बस आहट थी
किसी के कदमों की
ठीक वैसे ही जैसे पेड़ के अंदर से कोई पक्षी चहचाता हो
बस तेरी अनुभूति उसी आहट में सम्माहित होती गई
पानी किसी में मिलता
तो वैसा ही हो जाता
वैसे ही तू आई
विरक्त भाव के साथ आज भी  मैं
रास्ते पर था
पर मंजिल स्वयं दर पर
शून्य का तरह मै उसे समझ नहीं पाया
सहसा मेरी सांसे थम गई
निगाहें एकाएक पत्थर हो गई
वही पत्थर जो डूबने के लिए बना है
समय ने तुझे भी खड़ा  कर ही दिया
दर पर
तेरी विस्मयकारी आंखों के साथ
मेरी धडकने मिल जाती
क्यों आई तू इस पंक्षी के पास
मै अब नहीं उड सकता
मैं कट चुका हूँ
दिल पर हाथ रखे एक इंच मुस्कान के साथ
बस अलविदा


                                                       प्रियोदत्त शर्मा

Wednesday, 18 June 2014

लाल रंग (कविता)

  लाल रंग (कविता)

क्या काफी है केवल टोपी मुस्लमान की पहचान के लिए
क्या हाथ पर छपा ओम का चिंह ये दर्शता है कि तुम हिंदू हो
सिख की पग़ड़ी ही उसकी  मौत का कारण बनी थी
उस दौर में जब
बडा पेड़ गिरा था
कई पौधों की जडें लुप्त हो गई थी
लेकिन उससे  भी पहले
सदिया लहु पी चुकी  है
पानी नहीं
 वही लाल लहु
  जिसे देखते आज तेरा मेरा जिगरा विचलित हो उठता है
देख आज भी  शिया और सुन्नी हथियार के साथ है
बाबरी के नाम पर हिंदू भी  तैयार रहता है
रक्त बहाने को
शामली में बैठे वो लोग
जो बरसों से विस्थापन झेल झेल कर बंजारे हो गए है
क्यों कभी  सिख तो कभी  मुस्लमान कभी हिंदू तो कभी  कोइ काला गोरा
अपने अदम(अस्तित्व) को साबित करने के लिए खुंखार बनता है
जानते नहीं है वो चरमपंथी की लाल हमेशा
लाल ही होता है
चाहे लहु हो या किसी मां का बच्चा
आज वही हो रहा है खाड़ी देशों में
जो पहले कभी  हमारे तुम्हारे मुल्कों में हुआ था
वही लोग बाग सदैव ना जाने क्यों
मानव की पहचान के लिए धर्म की आड़ लेते है
कहां है उनकी संवेदना , कहां गया वो इश्फाक(दया भाव )
जिसकी कहानियां कुरान में
जिसके अध्याय गीता में
व जिसकी चौपाई गुरुग्रंंथ साहिब में लिखित है
बाईबल भी  तो सौहार्द का ही संदेश देता है
इतनी अवमानना करने के बाद
क्यों कर रहे हो बर्बरता की पालना
 हम पहले है हमारा धर्म बाद में
यह कोई समझाओं उनको
याद रखना की लहु बहाने वाले का जिगरा होता है
न की काटने वाले का
कमजोर विचलित होकर गाहे बगाहे हाथ मारता है
 तूम काटते जाउ
हम कटते जाएंगे
हंसी ही होगी हमारे चेहरों में
उस अंत समय में भी  हम भीख नहीं मांगेगें
अपनी बच्ची की जान की
जानते हो वो बच्ची भी  तुम्से नहीं डरती
तुम्हारी बंदूकों से
उस बदहवासी आवाज से
रुआंसे तुम लग रहे हो
शायद तुम्हारा मन नहीं भर रहा हमारी लाशों से
तो वो देखों लोगों का जखीरा आ रहा है
कटने के लिए
उठाओं अपने हथियार और देख लो हमारे लहु के रंग को
शायद अब हमारा लहू का  रंग शहीदी के रंग में रंगा हो
और तुम्हारे चेहरे पर खुशी लौट आए
                                                                                        प्रियोदत्त शर्मा

Sunday, 15 June 2014

मै आज भी जल रही हूँ (कविता)

  मै आज भी जल रही हूँ (कविता)

तेरे द्वार आने पर मुझे क्या मिला
तेरी पत्थर आँखे भी मेरे शौहर के ही भांति है
हालांकि मेरा जिस्म भी अब पत्थर हो चुका है
तू भी एज़ाज में मुझे आंसू देता
तेरी प्रार्थना करने के बाद
अब मुजाहमत सी होने लगी है जीने में
इस समाज के रीति रिवाजों की तरह
तू भी एक रु ढ़िवादी विश्वास है
सारी उम्र में तुझसे मांगती रही
एक साथ
लेकिन दिया तूने मुझे
अपनी ही तरह संवेदनशील
बचपन से मैं तेरी पुजारी थी
नारी हूँ ना दामन बस थामती हूँ
और थमाती हूँ
पारर्दशीता नजर आती थी मुझे
तेरी तासिर में
तेरे दीद ही मुझे
आस्तिक बनाते थे
परंतु तू भी वैसा ही निकला
तेरे दर पर मैं आज से नहीं
सदियों से मरती आ रहीं हूँ
मछली सी तड़प है
जो मुझे पल पल मारती है
बस मुझे सुकून दे
मालूम है कि तू अस्तित्वहीन , भ्रम है
मुझे विस्मय न होगा
क्योंकि तू भी तो पुरुष है
तेरी फितरत भी वैसी ही होगी
शायद तू भी भूखा है
प्रार्थना का, सेवा का
जानकी को तूने मिटा दिया
वो जानकी जो तिनके के सहारे
रावण से बचती है
जिसके शौर्य के आगे आग भी दम भरने लगी
तेरे शक से वो विचलत हो उठी
ठीक मछली की तरह
तेरी मर्यादा फिर भी बची रही
फिर मेरी क्या बिसात
बस मैं एक नारी ही तो  हूँ
अहिल्या के भांति
मै भी पत्थर हो गई
उसी जानकी की तर्ज पर
मै आज भी जल रही हूँ
और तेरी मर्यादा अभी भी बरकरार हैं
                                                       प्रियोदत्त 

Wednesday, 11 June 2014

ख़ालिस कौन (कविता)

  ख़ालिस कौन   (कविता)
मैं तेरे दीद को तरसता रहा
ठीक एक चकोर  की तरह
तुने दीवाना बनाया था मुझे
अपनी उस आह का, स्वरुप का
छल तो कतई नहीं हो सकता
तुम केवल मुझे परवान पर पाना चाहते थे
क्या है तेरी पराकाष्ठा इससे वाकिफ़ था मैं
तेरी तस्लीम(अभिनंदन) में थी मेरी आँखे, मेरे लरजते(हिलते) होंठ
मेरा इकबाल(सोभाग्य )था तेरा रुतबा, तेरा अस्तित्व
तेरे अश्फाक(सहारे) के लिए मेरे पास बस एक रात है
जज्बातों को जानने के बाद हमने देह को जाना
कुछ जज्बात तो नष्ट हो गये उस मिलन में
कुछेक के लिए जगह ही नहीं बची
बस एक प्रश्न था कि
ख़ालिस (पवित्र ) कौन?
                                       ( प्रियोदत्त शर्मा)



Saturday, 7 June 2014

प्यार की फितरत (कहानी

  प्यार की फितरत (कहानी)

बीते कुछ दिनों से पकंज को नींद नहीं आ रही थी, वैसे तो वो घोड़े बेचकर सोने की आदत से ग्रस्त था पर अब प्रतीत होता कि घोड़े बिक चुके है। उसके घोडे  खरीदने वाली अर्थात उसकी नींद चुराने वाली और कोई नहीं अपितु उसकी दोस्त माही थी।
 पहले तो उसने माही से नींदों में बात की , फिर काली काली रातों में जगी आँखों से गुफ्तगु होती रही, उसी जागी जागी सी नींद में वो माही को पा चुका था लेकिन माही उसे केवल अपना अच्छा दोस्त मानती थी पर पंकज उसे एक अहौदा देता, प्यार देने का ही तो नाम है। अपने साथी चाचा से यही सुना था उसने , दरअसल चाचा उसका दोस्त था जिसका असली नाम कोई कोई ही जानता जब से उसकी मोहब्बत किसी और की हो गई है तब से चाचा रात के अंधेरे को दूर करने के लिए शराब का सहारा लेता। जाति अलग होने के कारण चाचा का प्यार भी  अलग हो गया। पंकज को केवल इतना ही बताता कि मैं उससे मिला था शादी से पहले, ताकि उसके दिल की बात जान सकुं। मैंने उससे पूूछा पंकज कि तू क्या चाहती है? जवाब पता क्या आया ईज्जत तेरी भी  और माँ बाबा की भी , बस इतना बोलते ही चाचा चुप मानो आज  भी ईज्जत की परवाह पड़ी हो, चाचा की खामोशी ही बयान करती कि प्यार त्याग का ही तो नाम हैं।
धीरे धीरे पंकज ने कॉलेज में अपने दोस्तों के साथ रहना कम कर दिया और एकांत से नाते जोड़ने लगा। माही के दूर होते ही उसके दीद को तरसता पर जब वो सामने आती तो गर्दन इधर उधर घूमाता, बगीचे में पेड़ों के पीछे से निहारने का काम वो बखूबी करता। माही को देखते ही वो पेड़ के साथ पेड़ बन जाता। न जाने क्या हुआ था उसे पिछले एक वर्ष से कोई मतलब नहीं था उसे माही से... फिर ये अचानक  ऐसे सवाल उसे दुखी नहीे करते वो नकारता इन सवालों तलाश तो उसे केवल और केवल माही के प्यार की ही थी।
एक दिन निशा से उसने माही का फोन नंबर लिया रात में हिम्मत कर फोन किया न जाने इतना हौंसला अचानक कहाँ से आ गया उसमें शायद ये उसी माही का कमाल था जो रातों में उससे बातें करती ठीक एक कल्पना की तरह जिसपर वो अपने वजूद से ज्यादा यकीन करने लगा, ये विश्वास उसी ने पैदा किया।
फोन पर अपना नाम बताने के बाद उसने एक घबराऐं हुए अंदाज को एकाएक त्यागते हुए कह दिया कि मुझे तुम्से प्यार हैं, मैं कई रातों से सोया नहीं हूँ तेरी वजह से, दोष मंडता हुआ वो माही को बच्चों की तरह लगने लगा। माही ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बल्कि कहा कि कल हमें मिलना चाहिए।
तपाक से बोला हाँ कल मिलते हैं, इस खुशी में माही की प्रतिक्रिय भी  जाननी भूल  गया। अगले दिन दोनों मिले पंकज खुश था लेकिन माही की आँखों में वो नहीं देख पाया। उसकी भावनाओं का आदर करते हुए माही पंकज को अपने अतीत की और ले गई।
उसने उसे पहले प्यार के बारे में बताया जो उसे धोखा दे गया था,
- पंकज मैं और धोखे बर्दाश्त नहीं कर सक ती, पंकज क्या हम अच्छे दोस्त बनकर नहीं रह सकते वो बोला क्यों नहीं सवाल उसके पास कोई भी  नहीं था, निहता था बिल्कुल, न कोई चालाकी,न कोई फहरेब बस केवल प्यार से लैस आशिक।
- आज से हम दोनों दोस्त माही ने ये कहते हुए हाथ आगे बढ़ाया
- उसने हाथ मिलाते हुए कहा जरुर माही
  धीरे धीरे दोनों की फोन पर खूब बातें होने लगी, समझने लगे वो एक दूसरे को
एक दिन माही ने उसे कहा कि तुम सब कुछ साफ साफ कहो क्या आज भी  तुम ..
- इतना बोलते ही पंकज का प्यारनुमा ज्वालामुखी फट गया लगातार वो बोलता ही जा रहा था कि मैं तुम्हे धोखा नहीं दूंगा माही भावुक हो गई माही भी  अपना दिल हल्का करना चाहती थी।
- वो बोली कि वो मुझसे बहुत प्यार करते हैं
- पंकज जानबूझकर फोन पर हैलो हैलो करने लगा जैसे ये हैलो उस वाक्य को शायद बदल दें।
- माही बिना कुछ सुने वो खुद से भी  ज्यादा चाहते हैं मुझे, मैं उन्से प्यार नहीं करती बल्कि उनके प्यार से प्यार करती हूँ
- पंकज सोच रहा था कि धोेखें खाने के बाद इंसान कितना मजबूत हो जाता हैं।
- माहीं बोली वो मुझसे उम्र में 12 वर्ष बड़े हैं
- यह वाक्य पंकज के कान में तिनके  की तरह चुभे , संपूर्ण ब्रहमांड में यह गुंज रहा था। माही के रोने की आवाज ने पंकज को झिझोड़कर रख दिया वो आँसू दिख नहीं रहे थे लेकिन पंकज कहीं आज उन आसूओं के आब में बह न जाए
- पंकज बोला माही मैं तुम्से कल मिलना चाहता हूँ फिलहाल तुम चुप हो जाओं
अगले दिन मुलाकात हुई फोन पर माही ने जो बात बताई थी उसको लेकर वो सोच रहा था, वो सामने थी
माही ने कहा कि परम एक व्यवसायी हैं
पंकज तो अब प्यार करता था उससे काले रंग के चश्में से उसने अपनी आँखें ढक ली
माही क्या तुम्हारा उन्से शादी का प्लॉन है?
हम पाँच साल से साथ हैं पंकज इसको लेकर बहुत बात हुई लेकिन हम शादी नहीं कर सकते
हमारा समाज के कुछ कायदे है जिनकी दीवार लांघी नहीं जा सकती ,पंकज केवल सुनना चाहता था, एक जिज्ञासा थी उसके अंदर ,
उनकी  शादी हो चुकी है और एक बच्चा भी  हैे, उनकी पत्नी पहली रात को ही उनके दिल से दूर हो गई वो किसी ओर से प्रेम करती थी, उसने उनको बताया तो वो स्तब्ध रह गये, इधर पंकज का भी  यही हाल था।
माँ बाप की ईज्जत के लिए शादी का बंधन उन्होने बांध लिया था लेकिन दो महीने बाद परम ने अपनी पत्नी के प्रेमी से उसका विवाह करवा   दिया, बच्चा उन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही  अनाथालय से गोद लिया हैं।
पंकज भूल  चुका कि वो माही को प्यार करता है, बस यह सोच रहा था कि क्या दूसरी बार परम समाज द्वारा निर्मित दीवारोें को पार कर पायेगा,
पंकज इस अधुरे प्यार को ही प्यार की फितरत मान कर माही के आँख से टपकते आंसू  पौंछता रहा।    
                                                                                     (प्रियोदत्त शर्मा)

Friday, 6 June 2014

इश्क शिव का भी रुसवाई से (कविता)

 

इश्क शिव का भी रुसवाई से (कविता)

अच्छा लगता है अब त्याग
ठीक दूर बसती महबूबा के लरज़ते होंठों की तरह
अब आँखे पढने लगी है
किसी  किताब को
एक खामोशी का अवलोकन कर रहीे है
शायद अब यही बाकि था
पहले नाकार कर ,
उस एहसास का मज़ाक  बनाकर
गलती तो हां तूने की हैं मेरी जान
लेकिन तूझे इससे ही तो जीना आया
दूरी को भी पीकर तू
जी रहा है दिल सीकर तू
मेरे अंजुमन से जुदा होकर
शायद अब खुद के लिए ही होगा तू
लोग तो निग्रा(केवल देखने वाले) है ही
उनकी आखों को देख मत
तेरा आइना तेरी छांया है
जो लुका चुप्पी खेलती है
तेरी  तकदीर ,तेरा जिस्म
छांया से दूर होते ही तू मेरी बांहों में टूट जाते  है
बिखर मैं भी जाता हूं तेरी दूरी से
एक सीमआब(पारा धातु) की तरह
रक्स करता हूँ तेरे वियोग में
ठीक शिव की भांति
शिव की अंधंगिनी की तरह
तू मेरी है पर
वियोग मेरा नहीं
वो अगालते मेरी नहीं
वो शरीर  मेरा है
पर ख्वाहिशें मेरी नहीं
ठीक उस शिव की तरह
जिसकी जटाओं में बसी गंगा
उसकी नहीं
जिसके सिर पर सजा चांद
उसका नहीं
तांडव तो लोगों की देन हैं
वो तो तडपता हैं
उसी वियोग में
केवल उसको शिवानगी ही शांत कर सकती हैं
वो उसका अंग है
उसके दीद के लिए वो तडपती नहीं
वो समाहित है उस
तीसरी आँख में
वो बसती हैं
 उसकी देह की भस्म में
परंतु शिव फिर मचलता हैं
धरती कापंती हैं
वियोग है, इश्क है उसे, मुझे
ठीक  तेरी और  शिवानगी की रुसवाई की तरह
                                           
                                                               प्रियोदत्त शर्मा
                                           







Thursday, 5 June 2014

आग से खाक होता (कविता)

  आग से खाक होता (कविता)

परवान न चढे वो इश्क ही नहीं
धूल न उढ़े वो आंधी कतई नहीं
चलता चलता अगर कोई लम्हा रुक जाए
तो समझों यह एक  साजिश होगी 
उस पल की 
जिसको तुने ठुकरा दिया
जलन तो होनी ही है अब ,तेरे पैरों में
यही रास्ता था वो जिसपर तू दौडा नहीं 
एक अश्फाक के लिए भटकता 
पथ से भी  बिछड़ गया तू 
लेकिन वक्त अब चाहता हैं 
कि तू मुतरिब की तरह साज को गाए
निकहत की तरह फिजा में घुल  जाए
वक्त चाहता है 
तू दौडे
एक जलन के साथ
ज्वलनशील बन जाए
राख हो जाए काटें तेरे ताप से
खुद  ही की  आग में तू भी  जलकर खाक हो जाए

Wednesday, 4 June 2014

बस एक आस(कविता)

तू मेरी तकदीर में नही
शायद ये गुस्ताखी होगी कायनात की
वो पहचान ना पाई
एक अबियत है तू
मैं एक शायर हूँ
तू किरण है
मैं वो धरती 
जिसपर तेरा अस्तित्व स्पष्ट होता है
तेरे ताप के निशान में झेलता हूँ
ये अनुभूति करवाते है
तेरे होने की
मैं घास हूँ
तू वो नम है
सोंधा सोंधा घूँघट है तेरा
हमारा एक होना जरूरी है
वैसे ही जैसे शिव और गंगा एक है
तेरे रंग में मैं बनारस हो जाता हूँै
कुछ तजुर्बे हमे अलग करते
लेकिन तेरे वो निशान
मुझे झूने का एहसास करवाते
और मैं फिर डूब जाता
उस आंनंद में
एक अलग दुनिया में
खो जाता मैं कहीं
ये खोना ही पाना है तुझेै
अलग होना विभीषीका है इस संसार के लिए
उस गगन के लिए जो हमारी बदोलत है
एक अफवाह रचता है वो
वो भी तेरा आशिक ै
लेकिन मैं आशिक नहीं
तेरा साया हूँ
जिस्म हूँ
रूह हूँ तेरी
एक त्रासहै उसके मन में
पर मैं बस एक आस पर जिन्दा रहता हूँ

(बनारासिया) 

Tuesday, 3 June 2014

झल्ला जाता हूँ (कविता)

 
रात की बारिश , साथ देता तूफान
न जाने क्यों  , अंधेरे को और घना कर देती है
एक गहराई का आगमन होता हैं
परछाई के साथ उल्लु रक्स (नाच) करते हैं
इस रात पर कविता लिखता मैं
झल्ला जाता हूँ,

आँख जब उन तारों की
आफताब से जो जा मिलती हैं
काली घटाओं के साथ, सुनसान रास्तों पर
एक खामोशी जब पसरती हैं
तो उसमें वीभत्सा नहीं
केवल मार्मिकता को देख मैं
डूब जाता हूँ,
वीरान उस पथ पर भी , बिना किसी साथ के
अकेले ही निकल जाता है राही
क्योंकि वहाँ बस रात बोलती है
राही चलता हैं,,, बस चलता  हैं
और मैं फिर झल्ला जाता हूँ.. डूब जाता हूँ
                                                     
                                                                   d´fi¹fûQØf Vf¸ffÊ


Monday, 2 June 2014

जवाब की तलाश में (लघु कथा )

   सहमी सी मौत के कारण वो यमराज के पास  वो ऐसे ही पहुँची, कपड़ों का  हाल बुरा था, चेहरे पर बर्बरता के निशान थे। यमराज के साथ चित्रगुप्त भी  हैरान था। क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई यमलोक को देखकर चिखे चिल्लाएं न।
आखिर इस बच्ची के साथ क्या हुआ है चित्रगुप्त, यमराज ने सवाल किया
-चित्रगुप्त ने मानवजीवन    बहीखाते की ओर नजर डाली और तलाशने लगे उस बच्ची के अतीत के बारे में थोडी देर के बाद चित्रगुप्त ने कहा कि महाराज इस बच्ची के साथ बहुत गलत हुआ है। इसकी असमत  लूटी गई है।
एकाएक वो चींख पडी , नहीं ...नहीं
असमत   मेरी नहींं.  उन माओं की तार तार हुई हैं जिनकी कोंख ने नौ महीने तक उन बाशिंदों को जगह दी। असमत  मेरी नहीं ...उस बाप की लूटी है जो सोचता था कि अपनी बिटिया को अफसर बनाऐगा। क्या दोष था मेरा ? यमराज अफसोस में था।
क्या तुम केवल देखने के लिए बैठे हो? उसने यमराज से पूछा
लोग आपकी जमात के कुछ को देवी देवता कहते है ,पूजा करते है आपकी , आस रखते है आप जैसे देवी देवताओं से
लेकिन आप अनादर करते है.
हमें यहां स्वर्ग नहीं चाहिए बस आप धरती को स्वर्ग बना दीजिए । आप क्यों भेजते है बेटियों को वहां ... क्यों भेजते है आप.…  वो रो पडीÞ,, बहुत दर्द   देते है हमें लोग.. कहीं आप इसलिए तो नहीं भेजते कि आप ही जैसी मर्द जात उसका लुत्फ उठा सकें?
यमराज उस दिन से उत्तर के लिए भटक रहा हैं और वो आज भी  जवाब के इंतजार में हैं

Sunday, 1 June 2014

तिराहा (लघु कथा


जैसे ही मीना ने उसे फ़ोन कर बताया कि शीतल वो तेरी याद में आज भी परेशान है'बस एक बार उससे बात कर लो । उसका नाम सुनते ही शीतल सिहर गई'बदन से कंपकपी सी छुटने लगी' ऐसा लगा जैसे किसी के सपर्श ने उसके अक्षत बदन को छु लिया हो।शीतल के समक्षसारी बातें एक दृष्य की तरह चलने लगी। अब वो भी परेशान ' लेकिन खिड़की से नाना जी को अपने कमरे की ओर बढ़ते देखा तो सब भूल गई
उसने मीना को शीघ्रता से कहा'आप फ़ोन रख दीजिये'कुछ नही हो सकता'हम उससे बात नही कर सकते'सब रास्ते बंद हो चुके है' बहुत बुरा हो जायेगा
इतने वाक्य वो एक साथ तपाक से बोल गई ठीक पागलों की तरह
मीना कुछ ना बोली शिष्ठाचार के तहत फ़ोन रख दिया।
फ़ोन कटते ही शीतल सोच में'मीना भी उसी बोध मे
थोड़ी देर बाद मीना ने प्रियदर्शन को फ़ोन किया और सारी बात बता दी' सहसा वो भी सहम गया ' उसकी चश्म ठहर गई

तीनो के कानो में फ़ोन कटने की वो आवाज़ थी' आसपास सुनसान' कुछ प्रशन तॆनात थे' समृति के कुछ चित्र आज जैसे किसी तिराहे (तीन रास्ते) पर पड़े हो
(बेदखल आशिक)ं

वक्त-वक्त गहराता सन्नाटा


मुझे अंजान जानते ही साडी के एक छोर में उसने गांठ मार ली थी, जैसे कोई मुल्यवान चीजÞ को वो मुझसे छुपाना चाहती हो। सड़क पर गाड़ियो की आवाजाही उसकी और मेरी बातों में खलल डालने को बेताब थी तेज़ चलते वाहन मानो एक इच्छा को कौंधते हो। हस्तशिल्प का कार्य करते करते हाथ की बुआईयों में कुछ कटाव थे ठीक वैसे ही जैसे सड़क के  किनारों पर बारिश की बदौलत कुछ दरारें। मुझे उसकी आँखों में दर्द नहीं दिखा। लेकिन बारिश तो उन आँखों में भी हुई थी।
    
  उस रास्ते से जाते वक्त न जाने क्यों में अचानक थम गया था शायद उस किनारे पर पडी   हस्तकला की  वस्तुओं ने मुझे रोक लिया, यह हुनर ही था कि मैं उसके पास जाकर कुछ जानने को इच्छुक हुआ। मेरी जिज्ञासा ने मेरी गति को एक ठहराव दिया और तपती गर्मी में भी मेै उसके पास ठीक उसी तरह बैठ गया जिसप्रकार वो जमीन की छाती पर बहुत ही सुकून के साथ बैठी थी, उन दफ्तरी कुर्सीओं में वो अहसास कहाँ (यह प्रश्न मेरा था), उसके बिल्कुल सामने बैठे हुए, मुझे उसके चेहरे पर आँसु की एक सुखी लकीर दिखी जो उसके रोने का बयान कर रहीं थी। 
  
बैठते ही मैंने उससे पूछा कि आप यह लकड़ी की कुर्सी, सोफे क्या स्वयं बनाते है? मेरे सवाल को उसने बहुत सहज लिया।
-नहीं यह हम असम से लाते हैं।
-कितने समय के पश्चात आप असम जाते है?
-हम नहीं जाते सामान ट्रक से आता है, कई-कई बार हमारा सामान भी पकडा जाता हैं
  उसकी आवाज में भारीपन आ गया मानो किसी ने पत्थर रख दिया हो
-आपको यहाँ इस सड़क के किनारे रात में हमारे सिपाही तंग नहीं करते?
-नहीं, कभी नहीं
-चोरी वोरी हुई कभी
-अभी तक तो नहीं हुई
देश की कानून व्यवस्था और चोरों के नैतिक मूल्यों पर मुझे गर्व हुआ। वैसे भी लेखक इनके काम पर लगातार नजर रखे हुए है फिल्मों से लेकर वास्तविकता में पुलिस का देरी से आना और चोरों का मजबूरी में चोरी करना लेखक के मन में दोनों वर्गो के प्रति संवेदना का बीज बौता हैं।
मैंने उनसे उनके पति के बारे में पूछा तो जवाब आया कि सामने दारु पीकर जो पॉर्क की हवा में सपने ले रहा है, वो मेरा पति है। (दारु पीकर मारना, गाली देना इनका धर्म हैं)
आपके बच्चे ?
-वहीं रहते है गांव में, पढते है तीनों
अच्छा ...
सामने उनका पति अब उठ गया था, लेटे लेटे ही अपने धर्म का पालन कर रहा था। मेरे कदम भी सीधे हुए, खडा होकर चल दिया.. बस एक ही बात निकली कि वक्त वक्त की बात है। सड़क पर दौड़ती गाड़ियों ने हमारी बातों में खलल नहीं डाली बल्कि सन्नाटा था वहाँ जो उसके हर बयान से गहराता था।
                                                                                              (प्रियोदत्त शर्मा)
                                                                                             लेखक कदापि नहीं