Thursday, 31 July 2014

लकीरे

नया-नया घर अभी  लिया है हम जैसे  प्रवासियों के लिए किराए का मकान भी  लेना ही कहलाता है, सीढीयां इतनी सकरी मानो पुरानी दिल्ली की गलियां, ऊपर दरवाजा खोलते ही गंदगी ने हमारा स्वागत किया , कुछ अखबार जो रेत की एक परत से ढक चुके थे, कूड़ा जो हमसे पूर्व रहने वाले किराएदारों द्वारा ऐसे छोड़ा गया था जैसे कोई पूर्वज अपने वंशकों के लिए एक विरासत। मैं और मेरा दोस्त एक दूसरे का चेहरा ऐसे देख रहे जैसे पहली बार हमने एक दूसरे  चेहरे के दर्शन किये हों। कुछ खाली बोतले थी जो इधर उधर बिखरी पडी थी। हम सफाई के लिए झाडू, वाईपर, बाल्टी वो भी  पानी के साथ व एक सुखे कपडे से लैस थे। सफाई की शुरूआत हमने उत्साह से की मैं कूडा उठाने लगा वो झाडू से मिट्टी समेटने के काम में लग गया, कूड़े में एक टूटी पेंसिल मेरे हाथ लगी, दो मैली रबडे जो अक्सर कुछ मिटाने के काम आती, बिस्कुट जो मानो ऐसे लगा रहें हो जैसे जल्दी जल्दी में कोई बीच में  छोड़कर चला गया हो। बच्चे की कलाकारी दीवारों पर अंकित थी। अंतहीन लकीरें, जिनका न कोई अर्थ, बिना किसी रुपरेखा के लेकिन फिर भी  जीवित हम उसे मिटा नहीं पाए।
                   
                                                            (प्रियोदत्त शर्मा) दोस्त रामकिशोर के साथ रोहतक(हरियाणा)

Sunday, 27 July 2014

युद्ध व्यवसाय है (कविता)

युद्ध व्यवसाय है  (कविता)

28 जुलाई आ गई
सौ वर्ष पूर्व
कोई मैदान न था
बस लोग तैनात थे
एक बाग में खड़े पेड़ की तरह जड़
वो एक झुंड, जो मानो इशारे का इंतजार में हो
कुछ दूरबीने निगाह बनी थी
बंकर हथगोलों से भरे थे, ठीक उस झलकते पैमाने की तरह जो कभी  बिखर जाता तो कभी  थोडा खाली सा देखता
बाल्कन प्रायद्वीप पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए
शुरू हुआ था सब
तुर्की ने स्वयं घोषणा की
शक्तियों में टक्कर हुई
बिस्मार्क नेपोलियन द्वारा किए शोषण का बदला लेना चाहता था
खुन पीना चाहता था वो
कारणवश उसे खुनी शैतान की उपाधि मिली
विडो विल्सन खारिज करने के लिए ही शांति प्रस्ताव लाया
लोग भिड़े , कोने कोने के ,जो अपने प्रतिद्व्ंधि की राष्ट्रीयता तक नहीं जानते थे
अस्सी लाख मरे इस त्रासदी में
कईयों के अंग कटे
कई दिमागी लाचार हुए
सुना है वो सोए नहीं सदियों तक
भटकते रहे , झांकते रहे , बस वो सोए नहीं
एक कर्बिस्तान से रो रहे हैं आज भी

महबृूबा का खत, मां के आंचल की पग उस सरदार के सिर थी
यहुदी ने अंगुली में अंगुठी के  बीच कुछ यादेंं छुपा रखी थी
सब कुछ छुटता गया
ये  विश्व युद्ध था
न ही कोई बुुद्धिजीवी इसे प्रथम, न ही द्वितीय की फेहरिस्त में रख सकते हैं
ये सौ साल पूर्व थमा ना था , उतरार्द्ध में उफन जाता
चल रहा है गाजा में, युक्रेन में, इराक की गलियों में भी
हर मौहल्ले में ये चल रहा है
प्रस्ताव आज भी आ रहें हैं
बस केवल खारिज होने के लिए
युद्ध निरंतर प्रक्रिया बन चुका है
एक व्यवसाय बन चुका है
जहां बसते घर उजाडे जाते
जहां किलकारियां चीखों में बदलने का काम करती
संवेदना स्वयं नाश हो जाती इस व्यवसाय में
बचता तो केवल एक हथियार
जो फिर कभी  व्यवसाय के काम आएगा
जो फिर कभी  काम आएगा
                                                                       प्रियोदत्त शर्मा

Sunday, 20 July 2014

यही मयस्सर है यहां (कविता)

 यही मयस्सर है यहां          (कविता)

त्रिशुल उठाओ
उतार दो मेरी छाती में
बाणों की सेज बिछाओं
सुला दो उसपर मुझे
करपान निकालो रेत दो मेरा गला
जिस चाकु से तुम मंत्र फूंकते हो
आज वो मेरे बदन को गोदने के काम आएगा
हां मेरी कोई जाति नहीं
यहूदियों की गोली मुझे झेलने दो
वो पीतल मेरे यकृत को चीरना चाहिए
इतनी गति होनी चाहिए उस पीतल में
वो मेरे विचारों की गति थाम सके
मेरा कोई नाम नहीं
मैं ना प्रवासी हूँ
न निवासी

इतना करने के बाद विस्मय
न रखना
अपने जिहाद के प्रति
अपने धर्म
अपने कलमे
बाईबली कहानियों पर कभी
संशय का बिंदू न स्थापित होने देना
मेरे भाव को ना समझ
तुम रखना एक विरक्त भाव
जो केवल रक्त से सना हो
कुरबानी व्यर्थ नहीं जाएगी
तेरे बाणों की
तोप के गोले की
ऐके 47 से निकलती गोलियों की
ए गोलियों की आवाज समोहित करती
रूस को
अमेरिका को
कुछ चरमपंथियों को
भाता वो माहौल
जब बिलबिलाते हुए लोग मरते
बच्चे माओं की लाशों के सामने रोते
जब वो बूढा बाप अपने जवान बच्चे के कटे अंग देखता
कुछ तो केवल घड़िया देखते
हाथ की अंगुठी देखकर
टूट जाते
पर तुम्हे क्या
कई मर्तबा देखा है तुम्हे बर्बरता की  हद पार करते हुए

तुम उनको बेनाम मानते हो
अपना हक मांगते हो
हम देते है तुम्हे इसानी
गोश्त
लहू से सना
बारुद सा महकता
पैटाशियम के खंजर में
अटका वो टुकडा
जानवरों के लिए यही मयस्सर है यहां
                                         

                                            प्रियोदत्त शर्मा

एक बच्चा

रास्ते पर चलता चलता मेैं अक्सर एक अंतहीन सोच में डूब जाता, दफ्तर की ओर जाते मुझे न तपते सूरज की सूध रहती, न ही आसपास घटित होती उन घटनाओं की जो कभी कभी अनायास ही घट जाती। पर उस दिन समाचार सुनने के बाद मैं सीधे दफ्तर को निकला ही था कि रास्ते मैं एक बच्चा खेलता दिखा। जिसकी आंखों में ख्वाहिशें पल रही कि भविष्य सुनहेरा होगा ठीक गोरेया के पंखों की तरह, जो आसमां की ऊंचाइयों को अपने मात्र छोटे छोटे पंखों से लंबी दूरी तय कर लेती।वैसे ही उसके कदम थे, छोटे छोटे 
चूंकि मैं समाचार देखते समय यह देख कर आया था कि एक छोटा बच्चा भी उस बम का शिकार हुआ जो इज्राइल ने फिलीस्तान पर गिराए थे। मेरी कल्पना उस ओर सोचने लगी मैं फिलीस्तान में था सामने वो बच्चा और चारों तरफ सिर्फ तबाही तबाही,कुछ खिड़कियां ,टूटी छत । आंखें स्तब्ध हो गई, रक्त ठहर गया और मेरे सामने वो बच्चा उस गोले का शिकार हो गया, मैं देखता रहा फिर दफ्तर पर आकर समाचारों का सिलसिला शुरु हो गया। बच्चे मरते गए हम देखते गए, उनके भविष्य नहीं अपितु हम अपने समय को लेकर चिंतित नजर आ रहें हैं।
छोड़ दो उन्हें
नहीं उनका कोई कसूर
उतारना है तो बारुद
मेरी देह में उतारो
मै उनका हितैषी हूँ
मेरी कलम उनके लिए है
ये कागज उनके लिए है
ये  जज्बात उनके लिए है
                       
                                                    प्रियोदत्त शर्मा

Wednesday, 16 July 2014

ये कैसी मामूल है
मै समझ नहीं पाया
यहां कभी झुकना
थोड़ा टूटना
रोशनी से भी जलना
ये कैसी मामूल है
मै समझ नहीं पाया

Tuesday, 15 July 2014

एक निश्चित अवधि (कविता )

एक निश्चित अवधि (कविता )

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Thursday, 10 July 2014

सांप्रदायिकता का गुबार (कविता )

सांप्रदायिकता का गुबार (कविता )

ना जाने कितनी चींखे उठी होंगी
वियतनाम में
हिरोशिमा में
नाकासाकी में
गगन उस दिन धुएं के रंग में रंगा था
रक्त से धरती का आंचल सना था
आसमान के असली रंग की तरह
उस रोज होंठ नीले थे लोगों के
मछली की तरह तड़प रहे थे सब
जल नहीं मयस्सर था वहां
सबकुछ इतनी जल्दी हुआ
समझ ना सका वो देश
वो धरती श्मशान बन गई
वहां जला नहीं कोइ
बस तड़पते रहे
सोचता हूं अक्सर
कि क्यों  इतनी चींखे
नहीं कर पाई होगीं मुकाबला
उस गुबार का
जो हवा में शैतान की तरह तैनात था
चीर नहीं पाई  वो चींखे
 फटते जिगरे की भी  आवाज
 शुन्य साबित हुई
परमाणु अकेला नहीं होगा
वहां कुछ शैतानिया होंगी
वहां कुछ नीतियां होंगी
सांसों में जाकर उफान पैदा करता
मैने ऐसी बातें वियतनाम की उस बच्ची से सुनी हैं
जापान के लोग आज भी  परमाणु और उफनती अधड़
सांसों के बीच जीते हैं
चिली में ग्रासिया ने  बर्बरता का इतिहास लिखा
पाब्लो की किताबें आज भी  वैसे ही चीखती हैं
मेरे कानों में
वो जिंदा हैं
कई बार अफगान से होती हुई
पाकिस्तान को मारती
भारत भी  आई
परमाणु नहीं यहां मौजूद था
यहां तो हर हर महादेव
बिस्मिल्लाह अल रहमान
जो बोले सो निहाल
जैसे नारों ने मिलकर
यह काम किया
जो कभी  रसायनों के तर्ज पर होता था
आज  धर्म के बिनाह पर टिका
कालांतर से अब तक  तरिके बदले
लड़ने के, लड़ाने  के 
लेकिन लाशें वहीं थी
रक्त उसी तरह लाल था
नीतियां भी  वैसी ही थी
मरने वाले भी  वही
औरतों के कटे वक्ष
बच्चों के अलग धड़
यही देखे
सांप्रदायिक्ता का जलता टायर
उस सिख के गले में था
इसकी जड़ में कुछ पंडित
कुछ ईमान जकड़े थे
जो आज भी  गुबार उठाने के लिए तैयार हैं
बस एक बार बोलो हर हर महादेव
बिस्मिल्लाह

                प्रियोदत्त शर्मा