Thursday, 10 July 2025

‘मैं अपने देशप्रेम को ओढ़कर नहीं घूमना चाहता’

मेरा बचपन और मेरी परवरिश एक रूढ़िवादी मुस्लिम घर और एक रोमन कैथोलिक परिवार के साथ साथ एक ईसाई स्कूल में हुई। हरेक चरित्र ने मुझे ये बताया कि क्या हो सकता है? कैसा हो सकता है? और मैं दोनों धर्मों के बारे में ये जानता था कि मुझे किसके बारे में क्या पसंद है और क्या नापसंद। 


उदाहरण के तौर पर, मुझे लगता है कि यह कहना काफी अन्यायपूर्ण है, कि ‘हमें छोड़कर’ मैं अपने आसपास हो रही बाकी चीजों को कभी देख ही नहीं पाया। बचपने में, मैं पुष्कर गया था, वहां एक जैन मंदिर था और जटाओं वाले भगवाधारी संत जोकि हरे रंग के कपड़े पहने सूफियों के साथ अपना चिलम शेयर कर रहे थे, सिख श्रद्धालु और हिंदू श्रद्धालु उन्हें घेरे हुए थे। 

अढाई दिन के झोपड़े में जो नमाज हो रही थी, वो पूरा इलाका हिंदू मूर्तियों से घिरा था। मैंने सोचा कि ये कितना कूल आइडिया है। महान शंकर शंभू ने ख्वाजा जी के लिए कुछ गाने गाए, उनके साथ बाकी कव्वाल और बाउल सिंगर भी वहां मौजद थे।  

मैंने अपने आप को कभी एक मुस्लिम के तौर पर नहीं देखा ना ही मेरे आसपास के माहौल ने कभी मुझे ऐसा महसूस होने दिया, इस बात से कभी कोई फ़र्क नहीं पड़ा। मैं अपने ‘उस देश’ को मिस करता हूं। 

कौमपरस्ती (अंधभक्ति), नफरत और कभी ना थमने वाली लड़ाई ने लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित कर दिया है कि वो अपने अंदर बसी कट्टरता को खत्म करने की जहमत भी ना उठाएं। 

ठीक इसी समय, चिंता की बात उनके लिए है जो ये सोचकर परेशान हैं कि देश किस ओर बढ़ रहा है। बेतुके बयान देकर अपराध को अंजाम देने वाली ब्रिगेड ने सारी सीमाएं पार कर दी हैं।

हिंदी फिल्मों की आलोचना करना आज आपको पलभर में एक अहसानफरामोश इंसान दर्जा दिलवा देता है। जबकि अपने पेशे के लोगों के साथ खड़े होना आपको देशद्रोही घोषित कर देता है। जो लोग खुद ट्रैफिक के नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं, और आपको बताते हैं कि अपने आर्टिस्ट दोस्त के साथ खड़े होने पर आप देश के खिलाफ खड़े हो। 

जो भी थोड़ा सा अलग है, वो अपने आप देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। एक टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ की लीड एक्ट्रेस ये सवाली पूछती हैं कि क्या पाकिस्तान में इंडियन आर्टिस्ट्स को परफॉर्म करने दिया जाता है। बिना इस बात को जाने हुए कि पाकिस्तान सिर्फ हमें वहां आने की आज्ञा ही नहीं देता बल्कि वो हमारा स्वागत करते हैं और सम्मान करते हैं। और ये उन सबके लिए है जो मेहंदी हसन को सुनते हैं, नुसरत फतेह अली खान के गीत गुनगुनाते हैं, फरीदा खानुम की गज़लें सुनते हैं, क्या वो सभी देशद्रोही हैं?

जाहिर सी बात है, कि वो भी सिर्फ प्रधानमंत्री ही होते हैं जो देशों के बॉर्डर पार करके सामने वाले को गले लगाते हैं। हम साधारण लोगों के लिए यह करना एक पाप है। क्या हमारे लिए इसमें कोई भी फायदा हो सकता है कि हम हरेक पाकिस्तानी से नफरत करें, उसके लिए नफरत जोकि उनकी सरकार और आर्मी ने किया है। और क्या ये सिर्फ और सिर्फ हमारी नफरत है?

जॉर्ज ओरेवल की किताब 1984 में एक रोज का रिवाज ऐसा दिखता है, जहां हर रोजमर्रा के काम छोड़कर कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ विरोधी पार्टी को गालियां निकालते हैं। क्या आज ये अनिवार्य हो गया है कि हम सब भी इस ‘दो मिनट की नफरत’ का हिस्सा बने। जबकि नफरत तो चौबीस घंटे चल रही है। बल्कि अब ये सिर्फ विरोधी पार्टी तक नहीं बल्कि ये जहर हवा में निराशा और भय का माहौल बनाए हुए है। इससे मुझे दुख होता है। नफरत आत्मविनाशकारी है। लेकिन जब गौरक्षकों की हरकतों को देखकर लगता है कि अब यह अनिश्चित काल तक बनी रहने वाली है।

बावजूद इसके की कभी भी नई नफरत का जन्म बड़ी आसानी से हो सकता है। मैं ‘राष्ट्रवादी’ और उन पैसा लेकर ट्रोल करने वाले लोगों के लिए बड़ा आसान टारगेट हूं। क्योंकि मैं अपने देश के प्रति प्यार को दिखाना और एक तरह से पहनकर घूमना नहीं चाहता। मैं जो महसूस करता हूं उसे जानता हूं, अपनी भावनाओं पर मुझे पूरा विश्वास है और इससे किसी और का कोई लेना देना नहीं।

मैं भारत में पैदा हुई अपने मुस्लिम परिवार की पांचवी पीढ़ी हूं, मेरी पत्नी तो मुझसे भी पुरानी हिंदू परिवार से ताल्लुकात रखती हैं। और हमें इस बात की उम्मीद है कि हमारे बच्चे हम दोनों का बेस्ट कॉबिनेशन हैं। मेरे पिता जी ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया था। जबकि उनके भाई जा चुके थे। वो इस बात को लेकर पूरी तरह से निश्चित थे कि भारत में हमारा भविष्य सुरक्षित है, जैसेकि पहले मैं भी सोचता था। यह एक ऐसा सपना था, जिसे बाद में धोखे का सामना करना पड़ा। 

अगर आपको दिलजीत के प्रति लिखी मेरी पोस्ट का जस्टिफिकेशन चाहिए तो ये वही है। पर फैक्ट ये है कि मुझे किसी को ये बताने की जरूरत नहीं। मैं जो कहना चाहता था कह चुका हूं और मैं उसके साथ खड़ा हूं। ना मैं इस बात की परवाह करता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री इसमें मेरा समर्थन नहीं कर रही, मैं इसकी उम्मीद भी नहीं करता। उनके पास खोने के लिए और मेरे विचार से ना सहमत होने के लिए काफी कुछ है। जो लोग मुझे ट्रोल कर रहे हैं, खासतौर पर वो जिन्होंने मुझसे कहा, ‘पाकिस्तान नहीं, अब कब्रिस्तान’, मैं बस उनके लिए जिगर मुरादाबादी का एक शेर पढ़ना चाहूंगा।

मुझे दे ना गैज़ पर ये धमकियां, गिरे लाख बार ये बिजलियां, 

मेरी सल्तनत यही है आशियां, मेरी मल्कियत यही है चार पर


(मुझे गुस्से में ये धमकियां ना दे, चाहे गुस्से की ये बिजलियां मुझपर लाख बार गिरें, मेरा घर ही मेरी सल्तनत है, और इसका मालिक मैं हूं।)



लेखक: नसीरुद्दीन शाह (फिल्म अभिनेता)

अनुवाद: प्रियोदत्त शर्मा


Wednesday, 9 July 2025

चलकर जाना तो ही जाना (डायरी- 1)

 देर तो हो गई लेकिन उसके बाद लंबी सांस ली, सोचा बादल आज काफी दिनों बाद देख रहा हूं। देर हो गई घर से निकलने में, कमरे में पड़े पड़े आलस तो नहीं, दिमाग उल्टा ज्यादा ही चल रहा होता है। इस डायरी को मैं अपने लिए पर्सनल रखना चाहता हूं। मैत्रेयी ने बोला था आज कि जो लिखते हो वो ब्लॉग में लिखा करो, इसलिए नहीं लिख रहा, बल्कि एक कारण ये है कि लिखना कम ही हो गया है। पर मुझे लगता है लिखा जा रहा होता है, आपके ना लिखने के बाद भी दर्ज हो रही होती है हर एक बात, हर एक दस्तावेज भीतर होता है, सुलग रहा। बस एक दिन बैठकर आप उसे फूंक देते हो और जला देते हो सारा का सारा। खेल खत्म, क्या ही उखाड़ लिया। काम पूरा, बस और क्या, इसके अलावा फिर आप जुटाते हो एक नया कल, ताकि उसको किसी आज में बैठकर काज की तरह से लिख सको। लिखते लिखते निकल गए कई। लेकिन देखने वाले कौन सा रह गए, वो भी तो जाते ही हैं, तो इस

Friday, 30 December 2016

शायर भी नहीं रोक पाया



2015 मेरा बहुत अच्छा दोस्त था
धीरे-धीरे चलता था
कतरे जैसा था वो
उसके कदमों की सरसराहट मैंने जाते वक़्त महसूस की
मैं जानता था वो वापस नहीं आयेगा
उसकी रवानगी के दौरान मैंने अपनी यादों की जेबों में उसके कुछ निशां समेट लिये

कल 2016 आयेगा
कुछ दिन तो मैं 2015 से ही दोस्ती रखूंगा
उसे ही याद करूंगा
2016 के सामने मैं 2015 की तारीफ़ करूंगा
2016 चिढ़ जायेगा
मैं 2015 को मिटा कर उसे मनाऊंगा
उसकी बाहें थाम कर कई राहें तय करनी हैं मुझे
डायरी से लेकर सैलरी स्लिप में वो मिलता रहेगा
हर रोज़ कम्प्यूटर की स्क्रीन पर दिखता रहेगा
कई सारे प्लान उससे जुड़ जायेंगे
एक रिश्ता सा हो जायेगा हमारा 
एक दिन 2016 भी चला जायेगा
शायर उसे भी नहीं रोक पायेगा
बस उसकी याद में कविता लिख जायेगा

                                                                (प्रियोदत्त)

Monday, 29 August 2016

अलाव...

चिंगारी सी जलती है इक सीने में
उसे पहले मैंने दिल की पंखी से झलना शुरू किया
फूंक भी रहा था साथ-साथ उसे
पर बेताबी के चलते ख्वाबों का सारा बचा तेल उडेल दिया
धुआं उठा, सांसों में अटकने लगा
आतिश जलाई ही थी कि
एक शख़्स अपने बरसों पुराने हाथों में जमीं तन्हाई लिए आया
सेकता रहा वो रात भर अपनी तन्हाई को
मेरे सीने में जलाता अलाव ना जाने कब उसका हो गया

                                                                           (प्रियोदत्त)

Sunday, 5 July 2015

मौत की राह पर पत्रकार (कविता)

एक मरता पत्रकार
एक सोचता पत्रकार
एक लिखता पत्रकार
नसीबों पर रोता पत्रकार
जलता पत्रकार
क्या समाज की विसंगतियों को मिटाने की बदौलत ही इस परिणाम की उम्मीद रखता है
क्या वो अपने आस-पास के माहौल को सुधारने के चलते ही अपने घरों के चुल्हे बूझा देता है
तुम उसे भडवा कहते हो
तुम उसे बिकाऊ कहते हो
तुम उसे दलाल कहते हो
लेकिन वो सचेत है और सचेत रहेगा
तुम्हें सदा तुम्हारा भयानक चेहरा आईने में दिखाता रहेगा
उसके जलते शरीर से तुम्हे गंध आती है
उसके मरते वक़्त तुम्हें केवल खब़रें सुहाती हैं
तुम घर में बैठकर अकुलाते हो
लेकिन वो मरता जाता है

या मरने की राह पर चलता जाता है...
                                प्रियोदत्त

Wednesday, 13 May 2015

कठमुल्लों मुझसे मुकाबला तो करो (कविता)

अक्सर तुम्हारे निशानें छूट जाते हैं
तुम जिस्म पर गोली मारते हो
गले को रेतते हो
अंगों को काटते हो
ऐसे कोई मरता है भला?
बताओ मुझे
मैं ऐसी मौत चाहता हूं तुमसे
जिससे मेरी रूह कांपने लगे
लोग तो आकबत से भी कांप जाते हैं
मेरे विचारों को मारो अगर मारना चाहते हो मुझे
मेरे अंदर ज़िंदा उस रोशनी को बुझा दो
मेरी कलम की स्याही को नहीं
मेरे आस-पास के हालातों को ख़त्म करो
जो मुझे किसी न किसी रूप में ज़िंदा करते रहते हैं
क्यों तुम हर बार मुझे गोली मारकर, गला रेतकर, बम से उड़ाकर
ज़िंदा करते रहते हो?
मैं चाहता हूं कि तुम जीतो
पर पहले मुझसे मुकाबला तो करो कठमुल्लों...
(प्रियोदत्त)

Monday, 12 January 2015



किरदार कभी मरता नहीं मंटो ने सपने में कहा मुझसे
खुशवंत सिंह की पाकिस्तान मेल (उपन्यास) का जग्गा व इकबाल भी वहां मौजूद थे
गुलज़ार की नज्में एक साफ़ चिटी(सफ़ेद) सी दीवार पर लिखी हुई थी
सूजे हुए पैरों को अपने साथ आज तक बरकरार रखें हुए
टोबा टेक सिंह उस दीवार को देखते हुए बोले जा रहा था
उप्पर दी गुड़-गुड़ दी मुंग दी दाल दी लालटेन
दी हिंदूस्तान ते पाकिस्तान दी दुर फिटे मुंह

सपने से बाहर आंख खुली तो में ये भूल चुका था
कि ये कौन सा देश है