Wednesday, 9 July 2025

चलकर जाना तो ही जाना (डायरी- 1)

 देर तो हो गई लेकिन उसके बाद लंबी सांस ली, सोचा बादल आज काफी दिनों बाद देख रहा हूं। देर हो गई घर से निकलने में, कमरे में पड़े पड़े आलस तो नहीं, दिमाग उल्टा ज्यादा ही चल रहा होता है। इस डायरी को मैं अपने लिए पर्सनल रखना चाहता हूं। मैत्रेयी ने बोला था आज कि जो लिखते हो वो ब्लॉग में लिखा करो, इसलिए नहीं लिख रहा, बल्कि एक कारण ये है कि लिखना कम ही हो गया है। पर मुझे लगता है लिखा जा रहा होता है, आपके ना लिखने के बाद भी दर्ज हो रही होती है हर एक बात, हर एक दस्तावेज भीतर होता है, सुलग रहा। बस एक दिन बैठकर आप उसे फूंक देते हो और जला देते हो सारा का सारा। खेल खत्म, क्या ही उखाड़ लिया। काम पूरा, बस और क्या, इसके अलावा फिर आप जुटाते हो एक नया कल, ताकि उसको किसी आज में बैठकर काज की तरह से लिख सको। लिखते लिखते निकल गए कई। लेकिन देखने वाले कौन सा रह गए, वो भी तो जाते ही हैं, तो इस

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