मेरा बचपन और मेरी परवरिश एक रूढ़िवादी मुस्लिम घर और एक रोमन कैथोलिक परिवार के साथ साथ एक ईसाई स्कूल में हुई। हरेक चरित्र ने मुझे ये बताया कि क्या हो सकता है? कैसा हो सकता है? और मैं दोनों धर्मों के बारे में ये जानता था कि मुझे किसके बारे में क्या पसंद है और क्या नापसंद।
उदाहरण के तौर पर, मुझे लगता है कि यह कहना काफी अन्यायपूर्ण है, कि ‘हमें छोड़कर’ मैं अपने आसपास हो रही बाकी चीजों को कभी देख ही नहीं पाया। बचपने में, मैं पुष्कर गया था, वहां एक जैन मंदिर था और जटाओं वाले भगवाधारी संत जोकि हरे रंग के कपड़े पहने सूफियों के साथ अपना चिलम शेयर कर रहे थे, सिख श्रद्धालु और हिंदू श्रद्धालु उन्हें घेरे हुए थे।
अढाई दिन के झोपड़े में जो नमाज हो रही थी, वो पूरा इलाका हिंदू मूर्तियों से घिरा था। मैंने सोचा कि ये कितना कूल आइडिया है। महान शंकर शंभू ने ख्वाजा जी के लिए कुछ गाने गाए, उनके साथ बाकी कव्वाल और बाउल सिंगर भी वहां मौजद थे।
मैंने अपने आप को कभी एक मुस्लिम के तौर पर नहीं देखा ना ही मेरे आसपास के माहौल ने कभी मुझे ऐसा महसूस होने दिया, इस बात से कभी कोई फ़र्क नहीं पड़ा। मैं अपने ‘उस देश’ को मिस करता हूं।
कौमपरस्ती (अंधभक्ति), नफरत और कभी ना थमने वाली लड़ाई ने लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित कर दिया है कि वो अपने अंदर बसी कट्टरता को खत्म करने की जहमत भी ना उठाएं।
ठीक इसी समय, चिंता की बात उनके लिए है जो ये सोचकर परेशान हैं कि देश किस ओर बढ़ रहा है। बेतुके बयान देकर अपराध को अंजाम देने वाली ब्रिगेड ने सारी सीमाएं पार कर दी हैं।
हिंदी फिल्मों की आलोचना करना आज आपको पलभर में एक अहसानफरामोश इंसान दर्जा दिलवा देता है। जबकि अपने पेशे के लोगों के साथ खड़े होना आपको देशद्रोही घोषित कर देता है। जो लोग खुद ट्रैफिक के नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं, और आपको बताते हैं कि अपने आर्टिस्ट दोस्त के साथ खड़े होने पर आप देश के खिलाफ खड़े हो।
जो भी थोड़ा सा अलग है, वो अपने आप देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। एक टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ की लीड एक्ट्रेस ये सवाली पूछती हैं कि क्या पाकिस्तान में इंडियन आर्टिस्ट्स को परफॉर्म करने दिया जाता है। बिना इस बात को जाने हुए कि पाकिस्तान सिर्फ हमें वहां आने की आज्ञा ही नहीं देता बल्कि वो हमारा स्वागत करते हैं और सम्मान करते हैं। और ये उन सबके लिए है जो मेहंदी हसन को सुनते हैं, नुसरत फतेह अली खान के गीत गुनगुनाते हैं, फरीदा खानुम की गज़लें सुनते हैं, क्या वो सभी देशद्रोही हैं?
जाहिर सी बात है, कि वो भी सिर्फ प्रधानमंत्री ही होते हैं जो देशों के बॉर्डर पार करके सामने वाले को गले लगाते हैं। हम साधारण लोगों के लिए यह करना एक पाप है। क्या हमारे लिए इसमें कोई भी फायदा हो सकता है कि हम हरेक पाकिस्तानी से नफरत करें, उसके लिए नफरत जोकि उनकी सरकार और आर्मी ने किया है। और क्या ये सिर्फ और सिर्फ हमारी नफरत है?
जॉर्ज ओरेवल की किताब 1984 में एक रोज का रिवाज ऐसा दिखता है, जहां हर रोजमर्रा के काम छोड़कर कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ विरोधी पार्टी को गालियां निकालते हैं। क्या आज ये अनिवार्य हो गया है कि हम सब भी इस ‘दो मिनट की नफरत’ का हिस्सा बने। जबकि नफरत तो चौबीस घंटे चल रही है। बल्कि अब ये सिर्फ विरोधी पार्टी तक नहीं बल्कि ये जहर हवा में निराशा और भय का माहौल बनाए हुए है। इससे मुझे दुख होता है। नफरत आत्मविनाशकारी है। लेकिन जब गौरक्षकों की हरकतों को देखकर लगता है कि अब यह अनिश्चित काल तक बनी रहने वाली है।
बावजूद इसके की कभी भी नई नफरत का जन्म बड़ी आसानी से हो सकता है। मैं ‘राष्ट्रवादी’ और उन पैसा लेकर ट्रोल करने वाले लोगों के लिए बड़ा आसान टारगेट हूं। क्योंकि मैं अपने देश के प्रति प्यार को दिखाना और एक तरह से पहनकर घूमना नहीं चाहता। मैं जो महसूस करता हूं उसे जानता हूं, अपनी भावनाओं पर मुझे पूरा विश्वास है और इससे किसी और का कोई लेना देना नहीं।
मैं भारत में पैदा हुई अपने मुस्लिम परिवार की पांचवी पीढ़ी हूं, मेरी पत्नी तो मुझसे भी पुरानी हिंदू परिवार से ताल्लुकात रखती हैं। और हमें इस बात की उम्मीद है कि हमारे बच्चे हम दोनों का बेस्ट कॉबिनेशन हैं। मेरे पिता जी ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया था। जबकि उनके भाई जा चुके थे। वो इस बात को लेकर पूरी तरह से निश्चित थे कि भारत में हमारा भविष्य सुरक्षित है, जैसेकि पहले मैं भी सोचता था। यह एक ऐसा सपना था, जिसे बाद में धोखे का सामना करना पड़ा।
अगर आपको दिलजीत के प्रति लिखी मेरी पोस्ट का जस्टिफिकेशन चाहिए तो ये वही है। पर फैक्ट ये है कि मुझे किसी को ये बताने की जरूरत नहीं। मैं जो कहना चाहता था कह चुका हूं और मैं उसके साथ खड़ा हूं। ना मैं इस बात की परवाह करता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री इसमें मेरा समर्थन नहीं कर रही, मैं इसकी उम्मीद भी नहीं करता। उनके पास खोने के लिए और मेरे विचार से ना सहमत होने के लिए काफी कुछ है। जो लोग मुझे ट्रोल कर रहे हैं, खासतौर पर वो जिन्होंने मुझसे कहा, ‘पाकिस्तान नहीं, अब कब्रिस्तान’, मैं बस उनके लिए जिगर मुरादाबादी का एक शेर पढ़ना चाहूंगा।
मुझे दे ना गैज़ पर ये धमकियां, गिरे लाख बार ये बिजलियां,
मेरी सल्तनत यही है आशियां, मेरी मल्कियत यही है चार पर
(मुझे गुस्से में ये धमकियां ना दे, चाहे गुस्से की ये बिजलियां मुझपर लाख बार गिरें, मेरा घर ही मेरी सल्तनत है, और इसका मालिक मैं हूं।)
लेखक: नसीरुद्दीन शाह (फिल्म अभिनेता)
अनुवाद: प्रियोदत्त शर्मा
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