निष्कृत मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता सईद
मुंबई हमलो के पांच साल बाद भी दोषी खुले आम
चुनौती दे रहे हैं। कुछ लोग केवल कसाब और उसके साथियों को दोषी मानकर अपनी सोच को
सर्किणता का दर्जा दे रहे। मैं ये नही कहता कि वह दोषी नही था लेकिन वो एक मोहरा
जरूर थे जो कभी सईद तो कभी आईएसआई के द्वारा चली चालों का शिकार हुआ। हमले का एक
दोषी हेडली सलाखों के पीछे तो दूसरा सईद जो पाक में खुलेआम पाया जाता है।
लोकतंत्रिक तरिके से चुनकर आये शरीफ़ कुछ ज्यादा ही शरीफ नजर आने लगे हैं।
सईद की जिहादी जङे पाक के गांव गांव
तक ठीक वैसे ही पहुँच गई है जिया उल हक का इस्लामीकरण कानून। अब ये मत समझिएगा कि
मैं इस्लाम की अवमानना कर रहा हूँ। जिया उल हक के ही नक्शे कदमों पर चल रहे है
सईद। कहते है हक के कारण ही सईद विदेश में पढ़ाई कर पाये अब साहब का कर्ज वो
नोजवानों को जिमात उद दावा में लेकर ही उतार सकते हैं। पाक में युवाओं को जब कोई वाहबी
सगंठन जिहाद के नाम पर चुनता है तो उनके गांव में एक जश्न का माहौल बनाया जाता है
और परिवारवालों से कहा जाता है कि आप खुशनसिब है कि आपका लडका इबादत के लिए मुकरर
हुआ है। इस मुकररनामे के तौर पर उनके परिवारवालों को लगभग छह हजार डालर भी दिए
जाते हैं। ये ठीक वैसा ही है जैसे बकरे को हलाल करने से पहले बहुत खिलाया पिलाया
जाता हैं बस फ़रक इतना ही है कि ये बकरा अपने साथ ओर लोगों को भी ले डुबता हैं।
आखिर सईद जैसे खुलेआम पाए जाने वाले जनावर
कबतक कसाब जैसी मजबुरी का फायदा उठाते रहेगें? जवाब आता हैं ये पेट रास्ते,मंजिल कुछ नही
देखता,ये तो सिर्फ महसुस करता हैं और जब इस भुख का दर्द हद से गुजरता है तो हाथ
में बंदुक हो या रोटी बस इसे पहचानने वाली मानसिकता निष्कृत हो जाती है।
No comments:
Post a Comment