Tuesday, 26 November 2013

निष्कृत मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता सईद

निष्कृत मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता सईद
 मुंबई हमलो के पांच साल बाद भी दोषी खुले आम चुनौती दे रहे हैं। कुछ लोग केवल कसाब और उसके साथियों को दोषी मानकर अपनी सोच को सर्किणता का दर्जा दे रहे। मैं ये नही कहता कि वह दोषी नही था लेकिन वो एक मोहरा जरूर थे जो कभी सईद तो कभी आईएसआई के द्वारा चली चालों का शिकार हुआ। हमले का एक दोषी हेडली सलाखों के पीछे तो दूसरा सईद जो पाक में खुलेआम पाया जाता है। लोकतंत्रिक तरिके से चुनकर आये शरीफ़ कुछ ज्यादा ही शरीफ नजर आने लगे हैं।
             सईद की जिहादी जङे पाक के गांव गांव तक ठीक वैसे ही पहुँच गई है जिया उल हक का इस्लामीकरण कानून। अब ये मत समझिएगा कि मैं इस्लाम की अवमानना कर रहा हूँ। जिया उल हक के ही नक्शे कदमों पर चल रहे है सईद। कहते है हक के कारण ही सईद विदेश में पढ़ाई कर पाये अब साहब का कर्ज वो नोजवानों को जिमात उद दावा में लेकर ही उतार सकते हैं। पाक में युवाओं को जब कोई वाहबी सगंठन जिहाद के नाम पर चुनता है तो उनके गांव में एक जश्न का माहौल बनाया जाता है और परिवारवालों से कहा जाता है कि आप खुशनसिब है कि आपका लडका इबादत के लिए मुकरर हुआ है। इस मुकररनामे के तौर पर उनके परिवारवालों को लगभग छह हजार डालर भी दिए जाते हैं। ये ठीक वैसा ही है जैसे बकरे को हलाल करने से पहले बहुत खिलाया पिलाया जाता हैं बस फ़रक इतना ही है कि ये बकरा अपने साथ ओर लोगों को भी ले डुबता हैं।

   आखिर सईद जैसे खुलेआम पाए जाने वाले जनावर कबतक कसाब जैसी मजबुरी का फायदा उठाते रहेगें? जवाब आता हैं ये पेट रास्ते,मंजिल कुछ नही देखता,ये तो सिर्फ महसुस करता हैं और जब इस भुख का दर्द हद से गुजरता है तो हाथ में बंदुक हो या रोटी बस इसे पहचानने वाली मानसिकता निष्कृत हो जाती है। 

Thursday, 7 November 2013

एक बाप ये भी हैं

एअरपोर्ट पर खड़ाआंखे खोलने पर एक बाप को देखा।लोगो की आंखे गडी हुई थी उस अलदीन के दरवाजे पर जहा कुछ लोग बहुत खुश थे। वही कुछ आँखों में दूरी थी जो जल्द गहरी होने वाली थी
अपनी बच्ची को एअरपोर्टछोड़ने आया वो बाप मानो ये सोच रहा हो की उसकी बेटी अब ना जाने उसके सामने कब आयेगी
वो बाप आज ये सोच रहा हैं कि बेटिया कब बड़ी हो जाती हैं पता ही नही चलता।ठीक ही कहती थी इसकी माँ की जब जाएगी ना तब देखुगी तुम्हे। आज इसकी माँ भी नही हैं और उसकी भवनाओ को समझने वाला कोई नही। किसी का कन्धा नही हैं जो मुझे थोड़ी राहत दे
और दूसरी और बेटी बाप के गले लगने वाला वो सपर्श सदेव याद रखना चाहती है।मानो वो बाप की खुशबू को अपने साथ ले जाना चाहती हों
बाप उसे जब तक देखता हैं जब तक वो ओझल नही हो जाती
बेटी का हिलता बाय बाय करता वो हाथ बाप को और विचलित करता और वो मानो ऐसा तडपता जैसे बिन जल के मछली
और बेटी बोर्डिंग के लिए चली गई
बाप की आँखों में पानी था
बेटी की आँखों में बाप का चेहरां

घर की दिवाली

मेरे कुछ दोस्त इस त्यौहार पर घर भी नही जा पाए।उनको बस यही कहना चाहता हूँ की माँ बापू जी तुम्हरे पास ही है बस आंखे बंद करो और देखो मन की आँखों से तुम हो अपने घर जहा माँ पकवान बना रही हैं।तुम नये कपड़े पहन रहे हों छोटा भाई/बहन तुम्हे देख रहा हैं ऐसे जैसे कोई हीरो तयार हो रहा हो।लो बापू जी/पापा आ गए तुम्हरी मनपसंद मिठाई लेकर।अब बस पूजा करो और मिठाई खाओ।तू देल्ली नही बस मन की आखों से घर चले आओ
अगर कुछ गलत लिखा हो तो माफ़ करना।
        दिवाली की शुभकामनायें