Tuesday, 26 November 2013
निष्कृत मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता सईद
Thursday, 7 November 2013
एक बाप ये भी हैं
एअरपोर्ट पर खड़ाआंखे खोलने पर एक बाप को देखा।लोगो की आंखे गडी हुई थी उस अलदीन के दरवाजे पर जहा कुछ लोग बहुत खुश थे। वही कुछ आँखों में दूरी थी जो जल्द गहरी होने वाली थी
अपनी बच्ची को एअरपोर्टछोड़ने आया वो बाप मानो ये सोच रहा हो की उसकी बेटी अब ना जाने उसके सामने कब आयेगी
वो बाप आज ये सोच रहा हैं कि बेटिया कब बड़ी हो जाती हैं पता ही नही चलता।ठीक ही कहती थी इसकी माँ की जब जाएगी ना तब देखुगी तुम्हे। आज इसकी माँ भी नही हैं और उसकी भवनाओ को समझने वाला कोई नही। किसी का कन्धा नही हैं जो मुझे थोड़ी राहत दे
और दूसरी और बेटी बाप के गले लगने वाला वो सपर्श सदेव याद रखना चाहती है।मानो वो बाप की खुशबू को अपने साथ ले जाना चाहती हों
बाप उसे जब तक देखता हैं जब तक वो ओझल नही हो जाती
बेटी का हिलता बाय बाय करता वो हाथ बाप को और विचलित करता और वो मानो ऐसा तडपता जैसे बिन जल के मछली
और बेटी बोर्डिंग के लिए चली गई
बाप की आँखों में पानी था
बेटी की आँखों में बाप का चेहरां
घर की दिवाली
मेरे कुछ दोस्त इस त्यौहार पर घर भी नही जा पाए।उनको बस यही कहना चाहता हूँ की माँ बापू जी तुम्हरे पास ही है बस आंखे बंद करो और देखो मन की आँखों से तुम हो अपने घर जहा माँ पकवान बना रही हैं।तुम नये कपड़े पहन रहे हों छोटा भाई/बहन तुम्हे देख रहा हैं ऐसे जैसे कोई हीरो तयार हो रहा हो।लो बापू जी/पापा आ गए तुम्हरी मनपसंद मिठाई लेकर।अब बस पूजा करो और मिठाई खाओ।तू देल्ली नही बस मन की आखों से घर चले आओ
अगर कुछ गलत लिखा हो तो माफ़ करना।
दिवाली की शुभकामनायें