Friday, 2 January 2015

रूहें (कविता)



जब ख़ूमारी थी तो इश्क भी था
उस रात में सब दीवाने ही थे
वहां मय़स्सर केवल कुछ रूहें थीं
कुछ अलहदा रूहें
अपनी आपबीती बतलाती
कभी नाचती, कभी नाराज़ हो जाती
रंग बदलते उन ज़ामों को थामें
कभी एक दूसरे के नजदीक आ जाती
मैं उनमें घूलता गया
उस रंग में मेरा भी रंग बेरंग हो गया
अकेले होकर भी मैं सबसे मिलता रहा
मानो कोई रिश्ता हो उनसे
पहली बार हम मिले
हमारा कोई नाम नहीं
हम बस उस वक्त के सानी थे
जैसे जैसे समय चढ़ता गया
रंग और गहरा होता गया
मैंने उस धुंए में खुद को घुलने दिया
सिगार सा जलने दिया
जिगर सा कटने दिया
जलते माहौल में आग संगीत की लगी थी
शायद कोई राग था वो
बढ़ते नशे के साथ मैंने उन रूंहों को चरम पर चढ़ते देखा
बेहोशी में भी मैं बस देखता गया उन्हें
उनकी एक एक जम्बिश को
हम सब रात के आधे मोड पर खड़े थे
वहां कुछ जाम अधूरे पड़े थे
कुछ पूरे हो चुके थे
संगीत वैसे ही बजता रहा
बस रूहें अब पानी पानी हो चुकी थीं
वहां उनके गीलेपन के निशां बाकी थे
      
                 प्रियोदत्त शर्मा

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