Sunday, 5 July 2015

मौत की राह पर पत्रकार (कविता)

एक मरता पत्रकार
एक सोचता पत्रकार
एक लिखता पत्रकार
नसीबों पर रोता पत्रकार
जलता पत्रकार
क्या समाज की विसंगतियों को मिटाने की बदौलत ही इस परिणाम की उम्मीद रखता है
क्या वो अपने आस-पास के माहौल को सुधारने के चलते ही अपने घरों के चुल्हे बूझा देता है
तुम उसे भडवा कहते हो
तुम उसे बिकाऊ कहते हो
तुम उसे दलाल कहते हो
लेकिन वो सचेत है और सचेत रहेगा
तुम्हें सदा तुम्हारा भयानक चेहरा आईने में दिखाता रहेगा
उसके जलते शरीर से तुम्हे गंध आती है
उसके मरते वक़्त तुम्हें केवल खब़रें सुहाती हैं
तुम घर में बैठकर अकुलाते हो
लेकिन वो मरता जाता है

या मरने की राह पर चलता जाता है...
                                प्रियोदत्त

Wednesday, 13 May 2015

कठमुल्लों मुझसे मुकाबला तो करो (कविता)

अक्सर तुम्हारे निशानें छूट जाते हैं
तुम जिस्म पर गोली मारते हो
गले को रेतते हो
अंगों को काटते हो
ऐसे कोई मरता है भला?
बताओ मुझे
मैं ऐसी मौत चाहता हूं तुमसे
जिससे मेरी रूह कांपने लगे
लोग तो आकबत से भी कांप जाते हैं
मेरे विचारों को मारो अगर मारना चाहते हो मुझे
मेरे अंदर ज़िंदा उस रोशनी को बुझा दो
मेरी कलम की स्याही को नहीं
मेरे आस-पास के हालातों को ख़त्म करो
जो मुझे किसी न किसी रूप में ज़िंदा करते रहते हैं
क्यों तुम हर बार मुझे गोली मारकर, गला रेतकर, बम से उड़ाकर
ज़िंदा करते रहते हो?
मैं चाहता हूं कि तुम जीतो
पर पहले मुझसे मुकाबला तो करो कठमुल्लों...
(प्रियोदत्त)

Monday, 12 January 2015



किरदार कभी मरता नहीं मंटो ने सपने में कहा मुझसे
खुशवंत सिंह की पाकिस्तान मेल (उपन्यास) का जग्गा व इकबाल भी वहां मौजूद थे
गुलज़ार की नज्में एक साफ़ चिटी(सफ़ेद) सी दीवार पर लिखी हुई थी
सूजे हुए पैरों को अपने साथ आज तक बरकरार रखें हुए
टोबा टेक सिंह उस दीवार को देखते हुए बोले जा रहा था
उप्पर दी गुड़-गुड़ दी मुंग दी दाल दी लालटेन
दी हिंदूस्तान ते पाकिस्तान दी दुर फिटे मुंह

सपने से बाहर आंख खुली तो में ये भूल चुका था
कि ये कौन सा देश है

Wednesday, 7 January 2015

चेहरे बेनक़ाब(कविता)



चेहरे बेनक़ाब(कविता)
कुछ दंगो में मरे
कुछ विकास के नाम पर मरे
कुछ पहनावे से पहचाने गए
कुछ की जुबां और बेबाकी उसको गोली लगने का कारण बनी
सब में एक बात समान सी लगी मुझे
सबका ख़ून लाल, चेहरे बेनक़ाब,
छुपा कुछ भी नहीं, सब खुलेआम
देखों आज मारने वालों के चेहरों पर नकाब सजे हैं
ओर मरने वाले पारदर्शिता की चादर ओढे पड़े हैं.
                   (प्रियोदत्त)

Friday, 2 January 2015

रूहें (कविता)



जब ख़ूमारी थी तो इश्क भी था
उस रात में सब दीवाने ही थे
वहां मय़स्सर केवल कुछ रूहें थीं
कुछ अलहदा रूहें
अपनी आपबीती बतलाती
कभी नाचती, कभी नाराज़ हो जाती
रंग बदलते उन ज़ामों को थामें
कभी एक दूसरे के नजदीक आ जाती
मैं उनमें घूलता गया
उस रंग में मेरा भी रंग बेरंग हो गया
अकेले होकर भी मैं सबसे मिलता रहा
मानो कोई रिश्ता हो उनसे
पहली बार हम मिले
हमारा कोई नाम नहीं
हम बस उस वक्त के सानी थे
जैसे जैसे समय चढ़ता गया
रंग और गहरा होता गया
मैंने उस धुंए में खुद को घुलने दिया
सिगार सा जलने दिया
जिगर सा कटने दिया
जलते माहौल में आग संगीत की लगी थी
शायद कोई राग था वो
बढ़ते नशे के साथ मैंने उन रूंहों को चरम पर चढ़ते देखा
बेहोशी में भी मैं बस देखता गया उन्हें
उनकी एक एक जम्बिश को
हम सब रात के आधे मोड पर खड़े थे
वहां कुछ जाम अधूरे पड़े थे
कुछ पूरे हो चुके थे
संगीत वैसे ही बजता रहा
बस रूहें अब पानी पानी हो चुकी थीं
वहां उनके गीलेपन के निशां बाकी थे
      
                 प्रियोदत्त शर्मा