Sunday, 28 September 2014

बहुत ही दिनों से हम प्रयास की वश में हैं जहां काम की ललक है, खाने का होश नहीं, बस कंप्यूटर की स्क्रीन लगातार डेस्क पर आते जाते पेज और आफिस के खाते की चाय का स्वाद हमें बोर करने लगा है, कमरे में फैली धूल, किताबें वहीं थमी है उन पर एक अदृश्य सी धूल की चादर मंडरा रही है जो द्रिखती नही ठीक वैसे ही जैसे कई घंटे काम करने के बाद भी पत्रकारों की थकान नजर नहीं आती बस वो बिस्तर पर महसूस की जाती है,

आह  बहुत दुख रहा है शरीर ..

Wednesday, 10 September 2014

मौन (लघु कथा)

मौन (लघु कथा)

एक वक़्त  ऐसा था जब हम दोनों भावना का रूप ले चुके थे, यहाँ कुछ शेष नहीं था केवल हम दोनों बरकरार थे, बंधनों को तोड़ने के  लिए, सीमाएं लाँघने के लिए हमने मोहब्बत की
एक दूसरे को देखते, सुनते, बोलते, कहते ना जाने कितना ही समय मानो एक अरसा सा बीत गया, सहसा अब हम थे यह वाक्य निकलते ही मैं गंभीर हो जाता हूँ, समीक्षा करने का साहस नहीं है मुझमें। जब जब मैं नजदीक आया तब तब दूरी गहराती गई मानों दोनों समानंतर हों,
इतने ज़ज्बात  उमड़ने के पश्चात एक दिन सन्नाटा सा छा गया, ना कुछ कहा गया, ना कुछ सुना गया, सबकुछ गतिशील होने के बाद भी वहाँ सब थम सा गया था, अचल, अनिश्चित सा, एक अंधेरा से लिपटी  हुई कुछ संवेदनाए वहाँ मयस्सर थी। शायद हम सब कुछ कह गए थे या फिर गहराई में उतरने की कमी थी तो ही तो वहाँ मौन व्याप्त था।
               
                                                   प्रियोदत्त शर्मा















Saturday, 6 September 2014

नमूना (न कहानी, न लेख केवल आँखोंदेखी)

नमूना (न कहानी, न लेख केवल आँखोंदेखी)

कल रोहतक के पीजीआई जाना हुआ मेरे साथ मेरा मित्र रामकिशोर भी था चूँकि बीते कल पांच सितंबर का दिन था एक तो अध्यापक दिवस ऊपर से हमारे अखबार(हरिभूमि) भी  इस दिन ही स्थापित हुआ था तो चार सितंबर रात को एक बजे काम करने के बाद कमरे पर गए व  पांच को सुबह होने वाली मैराथन दौड़ में •भी ड्यूटी लगाई गई थी, इतने दिनों के पश्चात हमारी मामूल में एक परिवर्तन सा आया था, सुबह बारिश में हम अपनी आँखों में रात की नींद लिए दफ्तर पहुँच गए। वहाँ हमें बच्चों के रजिस्ट्रेशन करना व टी शर्टबाटने काम दिया गया था, बच्चे अति उत्साहित, जीतने की आकांक्षा लिए, कहते भैया  टी शर्ट देना, मुझे भी , मुझे तो आपने दी ही नहीं। लेकिन कुछ  ही समय बाद टी शर्ट खत्म हो गई क्योंकि प्रतिभागियों की सँख्या ज्यादा थी व टी शर्ट बहुत ही कम, लेकिन उनमें उत्साह की कमी नहीं थी( मिल्खा सिँह अगर दूध के लिए भाग कर जीत सकता है तो ये  टी शर्ट के लिए क्यों नहीं) मुझसे जो भी पूछता टीशर्ट मिलेगी तो मैं कहता कि जीतने वाले को टीशर्ट मिलेगी केवल इस उम्मीद के साथ कि शायद ए लालसा ही किसी को विजेता बना दे। करीब  चार घंटे के बाद हम अपना काम निपटा कर पुन अपने कमरे की ओर चल पड़े, नौ बजे होटल में नाश्ते का आयोजन किया गया था हमने नाहने के बाद मुकेश महतो के साथ होटल का रूख किया, खाना खाने के पश्चात मैं और राम अपनी आँखों का जाँच करवाने के लिए, आॅटो से अस्पताल(पीजीआई) की ओर प्रस्थान किया हमारा पड़ोसी जो एक शायर और कवि का एक दर्दनाक सा संगम है, वो वहाँ(पीजीआई) लिफ्ट का काम देखता है,  भीड को देखकर उसकी याद आई, और उसे फोन किया, वो आया। एक रसूखदार आदमी को अपने साथ लिए, जिसने आते ही डाक्टर से हाथ मिलाया और हमारा चेकअप भी तुरंत हो गया हालांकि मुझसे पहले से आए कुछ लोग वहाँ मौजूद थे जिनका नंबर ना जाने कब आया होगा, मैं इस बात को लेकर बहुत दुखी हुआ लेकिन अपना चेकअप होने के बाद मुझे दूसरों की चिंता होने लगी, उससे पहले मेरी जुबान पर एक बार भी यह नहीं आया कि बगल में बैठी में वृद्ध स्त्री जो सही से बैठने की भी जहमत तक नहीं उठा पा रही है पहले उसे चेकअप करवाना चाहिए। मेरी नैतिकता ना जाने कहाँ  खो गई।
डाक्टर ने जाँच के बाद आँखों की मासपेशियों में कमजोरी बताई, कुछ दवाइयों व हमारे उस नए दोस्त के साथ हम बाहर आए। वो कहने लगा अगर आपके पास समय है तो मैं आपको संग्रहालाय दिखाता हम दोनों वैसे भी  कमरे पर जाकर सोने ही वाले थे तो सोचा क्यों ना इसका भी अवलोकन कर लिया जाए। मैं वैसे भी विज्ञान की कक्षा में फरार ही रहता था तो हम उसके साथ हो लिए कमरे में गए एक अजीब सी गंध आ रही थी। दो मैडम वहाँ बैठी थी तो उसने हमारा परिचय करवाया ये  लोग पत्रकार हैं तो मैडम भी सक्रिय हो गई, हमें मानव की आंतों से लेकर दिल, फेफडा, आदि दिखाया हालांकि ये सब अंग हमारे शरीर में भी थे लेकिन इनको शीशे के उस पार, एक रासायनिक पदार्थ में देखना हमारे लिए एक रोमांच सा ही था। कमरे से बाहर निकलते ही एक आधा दरवाजा खुला, सामने मुझे केवल कुर्सियां ही दिख रही थी हमने सोचा शायद कोई पुस्तकालय है लेकिन अंदर जाते ही आँखों के सामने नंगी लाशें थी, लाशें नहीं डाक्टरी भाषा में नमूने कहिए। हम दोनों स्तब्ध थे राम का हाथ जेब से रूमाल लेते हुए मुँह पर पहुँच गया था लेकिन मेैं सब भूल गया वो गंध भी , जो लगातार उस माहौल को बदबुनूमा बनाए हुए थी, मैं उनके चेहरे नहीं देखना चाहता क्योंकि जीवित इंसान भाव पढने में माहिर होता है एक के हाथ पर राजु लिखा था उसका नाम होगा शायद..
 वहाँ हमने अकड़े हुए शरीर देखे, मानो पत्थर हो वो, कुछ की बाहें खुली थी, कुछ के पेट को काटा गया, वहाँ कोइ भेदभाव नहीं था, सबका कुछ न कुछ काट काट कर शायद डाक्टर बनने की कोशिश कर रहें होंगे कुछ जीते जागते लोग। इसके बाद हमने हिम्मत करके अपने कदम आगे बढ़ाए मैंने व राम ने पीछे ऐसे देखा जैसे वो उठ बैठे हो, वो अंग कटे लोग, एक रसायन की परत वाले।
आगे हम अब पोस्टमाटर्म रूम की ओर चले गए उससे आगे के लोगों के लिए मेरे पास शब्द नहीं है लिखने को, वहाँ सन्नाटा, खून, हथौड़ा, कुछ परिजनों की देह का इंतजार करते लोग बस वहाँ हम अस्पताल में स्वयं को भी नमूना महसूस करने लगे थे।
                                                                                                               प्रियोदत्त शर्मा