Saturday, 30 August 2014

आलिंगन (कविता)

आलिंगन    (कविता)

ना जाने कितनी ही पक्तियाँ अधूरी थी
कितनी ही दफ़ा  नाराजगी जताई होगी
एक असमर्थता,
परंतु मैं उन्मुक्त भाव से तेरे आलिंगन  को तैयार हूँ
फिर टूटे रिश्ते की आवाज आई
एक पुकार
चींखें सुनाई देने लगी
 जो चीरती
ये वक़्त  है
एक मरहम
पहले इतना पास आए तुम
संभावना भी न होती थी
सांसों में एक निकहत बसी
शायद तुम ही हो
 सहसा दूर होती
मैं मर जाता
तुम मेरी बांहों में चेतन से अवचेतन होती
मैं  तुम्हें कविता के भँति पाने की तमन्ना करता हूँ
जो न कभी  खत्म हो, न ही संपूर्ण
केवल अधूरे ही हम पूरे हो जाते
                                       
                                          प्रियोदत्त शर्मा


Wednesday, 27 August 2014

जड़ पेड़(कविता)

जड़ पेड़(कविता)

मुझे पेड़ों से डर लगने लगा है
न जाने कब से मैं भयभीत  हूँ
यह अब छांव नहीं देते
यहाँ फलों का भी  अस्तित्व नहीं रहा
लाशे देखी हैं जब से मैंने इसकी मोटी शाखाओं से लटकती
तब से मैं मौन हूँ भावहीन जैसे जड़
स्थिरता छाई है,
अब ये  पानी नहीं रक्त पीते
सिंचे जाते है ये इससे
हटा दो इन्हें इस जहां
ये  अब आकबत बन चुके हैं बच्चियों के लिए
यहाँ तपस्या की थी कभी  ऋषियों ने
यहाँ देव निवास करते थे
ये  बरबरता कहाँ से पलने लगी?
खेतों में वस्त्र फाडे गए थे
लाज दाव पर थी
बिलबिला रही थी वो उस दिन भी 
शायद कृ ष्ण याद आता होगा
लेकिन वो न आया
उसका कुल भी  वनिस्पतियों के कारण नाश हुआ था
वो एक तरह की घास थी
खेतों की  उस घास की भांति
शांत, परंतु हतप्रभ  व मूक भी
शैतानों के चेहरे पर भी भाव  न थे
वहाँ केवल लालसा, हवस का साया था
वो पेडो पर लाशें देखने के आदी थे
नौचने वाले शैतान
जहाँ जिस पेड़ो पर सात्विकता वास करती थी कभी
अब वहाँ गर्देने लटती देख मैं शांत हो जाती हूँ
पेड़ की तरह, कृष्ण की तरह

                          प्रियोदत्त शर्मा


Monday, 4 August 2014


पत्रकारिता में होने के कारण रात को देर से सोना हो रहा है आजकल, वैसे ये  सब लगभग तीन माह पूर्व से चलता आ रहा है लेकिन ऐसा लगता है जैसे कल ही मैंने सस्थान में कदम रखा हो, पत्रकारिता में यह मेरा पहला अनुभव तो नहीं क्योंकि मैं पहले से ही गाहे-बगाहे हाथ मारता मारता इस किनारे तक पँहुचा हूँ, राष्ट्रीय अखबार होने के नाते चुनांचे(इसलिए) मुझे डेस्क पर फेंका गया तो रात को देर से खबरों से जद्दोजहद करके ही अब घर(कमरे )पर आना होता है, इस पेशे में आने के बाद या यूँ कहुँ कि इस संस्था में आने के पश्चात मैं स्वयं को पहले के वनिस्बत ज्यादा  संवेदनशील सा मानने लगा हूँ, रिर्पोटर अपना काम जैसे तैसे निबटा कर ख़बरें भेजता तत्पश्चात हमारा काम शुरू होता बहुत से शब्द मेरी स्क्रीन पर लैंड करते, कुछ साहनुभूति के लिए , कुछेक समाचार स्वयं ही प्रोपगेंडा होती तो बहुत सी ख़बरे मुझे झिंझोड़ देती स्तब्ध में सोचता रहता मसलन वो चोरी से संबंधित हो सकती थी या कोई दुष्कर्म इत्यादि। परेशान सा थका हारा सोचता सोचता एक ही रास्ते से वही बंद दुकाने जो दफ्तर आते वक़्त खुली होती, जहाँ बच्चे गलियों में घूमने निकलते, हम दफ्तर की ओर रुख करते, रात को सब बंद होता, हमारे स्वागत के लिए गलियों के कुत्ते, बोलती रात, चमगादडे तत्पर रहती।
 
 सुबह मैंने सदैव एक कूडे वाले को कूडा उठाते, प्रेस वाले को अपने उसी एक हाथ से प्रेस करते देखा, बंदरो के आगमन के कारण बालों पर कंघा करती वो महिला अंदर भाग जाती जैसे बंदर उसकी इंतजार में ही हों, सब्जी बेचने वाले बाबा मानो पसीने की गंध के साथ अपनी जीविका चला रहे हों, चूंकि वो लखनऊ के हैं इसलिए उनसे एक रिश्ता सा हो गया, झुका कमर, एक गंजिया(बनियान) जो कुर्ते पर से झाँकतीं जैसे कोई कुछ चाहता हों, कोई मांग जो आज भी  अधूरी हो, उनकी आवाज रुंधी ही रहती जैसे कोई गम लिए बैठे बस बोलने को मजबूर हों। ये  सब मैं रोज देखता हूँ,

 लेकिन आज जो देखा वो स्तब्ध(हैरान) करने वाला था, बैड रूम की खिड़की से मेरी नज़र बाल्कानी से होती हुई  एक सुन्दर सी मोहतरमा पर पड़ी जो अपने शाही कुत्ते के साथ पॉर्क में घूम रही, उसके कोमल कोमल पैर जब घास पर पडते तो घास भी  शरमा जाती हालाँकि वो नंगे पैर नहीं थी। एकाएक मुझे समझ में आने लगा कि यह लड़की अपने शाही कुत्ते को बाहर घूमाने आई है कुत्ते की पूंछ हिलती हिलती अनायास ठहर गई जैसे कोई आकबत आने वाली हो लेकिन कुत्ते ने अपना  पेट साफ कर लिया। वो इस बड़े से पॉर्क में अपने कुत्ते को मल  करवाने के लिए लाई थी? प्रश्न का वैसे तो सवाल ही नहीं उठता,
 जहाँ शाम को बच्चे खेलते शायद सुबह बुजुर्ग लोग नंगे पैर टहलते, अब उसकी सुन्दरता मुझे भद्दी लगने लगी क्योंकि वो पॉर्क के सौंदर्य पर कुछ मैले निशान छोड़कर जा रही है जो वातावरण के  सीने में भी शायद प्रभाव  छोडते होंगे और उन खेलते बच्चों को भी खेल इसीलिए बीच में छोडना पडेगा क्योंकि उसका  पैर गंदा हो गया , वो अपने शाही कुत्ते के साथ एक बड़े से मकान में चली गई, मल वहीं पडाÞ था, बच्चे आने शुरु हो गए थे।
                                                                      प्रियोदत्त शर्मा