जगा गई देश को वो लो
जो कभी भुज नही सकती
आग लगा गई वो लो"
"वो चांदनी थी
जो रात में नही
बल्कि रोशन ीहै उन आँखों मे
उस आंख में से आसू आज टपका गई वो"
"तेरी दास्ता ने हमे रुलाया
इन दरिंदो की दरिंदगी का तूने ही अहसास कराया"
अब आई है इन दरिंदो की बारी
देखे गी ये दुनिया सारी
हम देखना चाहते है।इनका अंत एक ऐसा अंत जो सीधे परहार करे उस मानसिकता पर 'उस दायरे पर जहा से ये सोच आई
जय हिन्द
ं
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