मुनासिब अंधेरा
बहुतेरे दिनों से कुछ लिखा नहीं है मैंने
परेशान सी हंसी चेहरे पर आ जाती है
मानो मैं जिया ही नहीं इतने दिनों से
मैं एक छोटी मौत की कैद में हूं
काल है वहां
घना साया
जो मुझे पकड़े हुए है
मैं कैद हूं
एक क्रब है वो जगह
जहां ना खुद की परछांई है
ना ही कोई रौश्नी सा अहसास
मैं वहां बस गया हूं
वो मेरे घर है अब
अंधेरा ही मुनासिब है मुझे
इस चिल्लाते जहां से
रौशनी का दामन ओडे
ना जाने क्या-क्या काला है यहां
यहां सब फरेब है
वहां अंधेरा सच बोलता है
भले ही मैं गुम हो जांऊ
उस सच में
भले ही मैं बस जांऊ वहां
यहां सब वैसा ही रहने वाला है
वहां एक शांति ने मुझे जीना सीखा दिया
यहां के दिखावे ने मेरा वास्ता दोज़ख से कर दिया
यहां आइने में चेहरा देखकर मेरी दरिंदगी का अहसास होता था मुझे
वहां वो आइना ही नहीं है
वहां वो आइना ही नहीं है
प्रियोदत्त शर्मा