Wednesday, 12 November 2014

राही (कविता)

उन काली रातों में मिट्टी लाल लगा रही थी
नदियों का रंग ना देख पाई
आसमान में पंछी ना दिखा कोई
चारों तरफ बस गुंजते नारे
जलते टायर
अकेले से पड़ चुके अलाव मुझे घूर रहे
मैं रास्तों में लाल रंग देख विचलित हो गई
बाजार खाली थे
कोना-कोना क्रबिस्तान था उस शहर का
अब सुना है हम यहां नही रह सकते
यहां लहू बहुत बह चुका हैं
किसी का भी घर नहीं इन जलते शहरों में
सीमाएं बट चुकी हैं
अब जाना होगा ना जाने कहां
अब हमारा कोई वतन नहीं
हम बस रास्तों पर चलते
दर बदर भटकते
विस्थापित होते राही हैं
बस राही ही हैं


                       प्रियोदत्त शर्मा